महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1813, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपराध्यन्ति सततं ये युष्मान् पीडयन्त्युत ॥ ४२ ॥ ‘वे समस्त देवद्रोही दुरात्मा असुर, जो सदा तुम्हें पीड़ा देते रहते हैं, निश्चय ही मेरा भी महान् अपराध करते हैं’॥ ४२ ॥ अहं हि तुल्यः सर्वेषां भूतानां नात्र संशयः । अधार्मिकास्तु हन्तव्या इति मे वतमाहितम् ॥ ४३ ॥ ‘इसमें संशय नहीं कि समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा समान भाव है, तथापि मैंने यह व्रत ले रखा है कि पापात्माओंका वध कर दिया जाय’॥ ४३ ॥ एकेषुणा विभेद्यानि तानि दुर्गाणि नान्यथा । न च स्थाणुमृते शक्तो भेत्तुमेकेषुणा पुरः ॥ ४४ ॥ ‘वे तीनों पुर एक ही बाणसे वेध दिये जायँ तो नष्ट हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उन तीनोंको एक साथ एक ही बाणसे वेध सके’॥ ४४ ॥ ते यूयं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् । योद्धारं वृणुतादित्याः स तान् हन्ता सुरेतरान् ॥ ४५ ॥ ‘अतः अदितिकुमारो! तुमलोग अनायास ही महान् कर्म करनेवाले, विजयशील, ईश्वर, महादेवजीका योद्धाके रूपमें वरण करो। वे ही उन दैत्योंको मार सकते हैं’॥ ४५ ॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः । ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा वृषाङ्कं शरणं ययुः ॥ ४६ ॥ उनकी यह बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता ब्रह्माजीको आगे करके महादेवजीकी शरणमें गये ॥ ४६ ॥ तपो नियममास्थाय गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम् । ऋषिभिः सह धर्मज्ञा भवं सर्वात्मना गताः ॥ ४७ ॥ तप और नियमका आश्रय ले ऋषियोंसहित धर्मज्ञ देवता सनातन ब्रह्मस्वरूप महादेवजीकी स्तुति करते हुए सम्पूर्ण हृदयसे उनकी शरणमें गये ॥ ४७ ॥ तुष्टुवुर्वाग्भिरिष्टाभिर्भयेष्वभयदं नृप । सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं सर्वमात्मना ॥ ४८ ॥ नरेश्वर! जिन्होंने आत्मस्वरूपसे सबको व्याप्त कर रखा है तथा जो भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, उन सर्वात्मा, महात्मा भगवान् शिवकी उन देवताओंने अभीष्ट वाणीद्वारा स्तुति की ॥ ४८ ॥ तपोविशेषैर्विविधैर्यौगं यो वेद चात्मनः । यः सांख्यमात्मनो वेत्ति यस्य चात्मा वशे सदा ॥ ४९ ॥ तं ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम् । अनन्यसदृशं लोके भगवन्तमकल्मषम् ॥ ५० ॥