महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1791, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूपाल! आज उस वीरके मारे जानेपर पर्वत, वन, द्वीप और समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी तुम्हारे पुत्र-पौत्रोंकी परम्परामें प्रतिष्ठित हो जायगी ॥ ४९ ॥
नाशक्यं विद्यते मेऽद्य त्वत्प्रीयार्थं विशेषतः ।
सम्यग्धर्मानुरक्तस्य सिद्धिरात्मवतो यथा ॥ ५० ॥
जैसे उत्तम धर्ममें अनुरक्त हुए मनस्वी पुरुषके लिये सिद्धि दुर्लभ नहीं है, उसी प्रकार आज विशेषतः तुम्हारा प्रिय करनेके हेतु मेरे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है ॥ ५० ॥
न हि मां समरे सोढुं संशक्तोऽग्निं तरुर्यथा ।
अवश्यं तु मया वाच्यं येन हीनोऽस्मि फाल्गुनात् ॥ ५१ ॥
जैसे वृक्ष अग्निका आक्रमण नहीं सह सकता, उसी प्रकार अर्जुनमें ऐसी शक्ति नहीं है कि मेरा वेग सह सकें; परंतु जिस बातमें मैं अर्जुनसे कम हूँ, वह भी मुझे अवश्य ही बता देना उचित है ॥ ५१ ॥
ज्या तस्य धनुषो दिव्या तथाक्षय्ये महेषुधी ।
सारथिस्तस्य गोविन्दो मम तादृङ् न विद्यते ॥ ५२ ॥
उनके धनुषकी प्रत्यंचा दिव्य है। उनके पास दो बड़े-बड़े दिव्य तरकस हैं, जो कभी खाली नहीं होते तथा उनके सारथि श्रीकृष्ण हैं, ये सब मेरे पास वैसे नहीं हैं ॥ ५२ ॥
तस्य दिव्यं धनुः श्रेष्ठं गाण्डीवमजितं युधि ।
विजयं च महद्दिव्यं ममापि धनुरुत्तमम् ॥ ५३ ॥
यदि उनके पास युद्धमें अजेय, श्रेष्ठ, दिव्य गाण्डीव धनुष है तो मेरे पास भी विजय नामक महान् दिव्य एवं उत्तम धनुष मौजूद है ॥ ५३ ॥
तत्राहमधिकः पार्थाद् धनुषा तेन पार्थिव ।
येन चाप्यधिको वीरः पाण्डवस्तन्निबोध मे ॥ ५४ ॥
राजन्! धनुषकी दृष्टिसे तो मैं ही अर्जुनसे बढ़ा-चढ़ा हूँ; परंतु वीर पाण्डुकुमार अर्जुन जिसके कारण मुझसे बढ़ जाते हैं, वह भी सुन लो ॥ ५४ ॥
रश्मिग्राहश्च दाशार्हः सर्वलोकनमस्कृतः ।
अग्निदत्तश्च वै दिव्यो रथः काञ्चनभूषणः ॥ ५५ ॥
अच्छेद्यः सर्वतो वीर वाजिनश्च मनोजवाः ।
ध्वजश्च दिव्यो द्युतिमान् वानरो विस्मयंकरः ॥ ५६ ॥
सर्वलोकवन्दित, दाशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्ण उनके घोड़ोंकी रास सँभालते हैं। वीर! उनके पास अग्निका दिया हुआ सुवर्णभूषित दिव्य रथ है, जिसे किसी प्रकार नष्ट नहीं किया जा सकता। उनके घोड़े भी मनके समान वेगशाली हैं। उनका तेजस्वी ध्वज दिव्य है, जिसके ऊपर सबको आश्चर्यमें डालनेवाला वानर बैठा रहता है ॥ ५५-५६ ॥
कृष्णश्च स्रष्टा जगतो रथं तमभिरक्षति ।
एतैर्द्रव्यैरहं हीनो योद्धुमिच्छामि पाण्डवम् ॥ ५७ ॥