महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextहाथियोंके चिग्घाड़नेकी आवाज सुनो। सहस्रों पैदल सिपाहियों तथा पृथ्वीको कम्पित करते हुए दौड़ लगानेवाले घुड़सवारोंके शब्द सुन लो॥ ७८॥ पुरस्तात् सैन्धवानीकं द्रोणानीकं च पृष्ठतः। बहुत्वाद्धि नरव्याघ्र देवेन्द्रमपि पीडयेत्॥ ७९॥ नरव्याघ्र! अर्जुनके सामने सिन्धुराजकी सेना है और पीछे द्रोणाचार्यकी। इसकी संख्या इतनी अधिक है कि यह देवराज इन्द्रको भी पीड़ित कर सकती है॥ ७९॥ अपर्यन्ते बले मग्नो जह्यादपि च जीवितम्। तस्मिंश्च निहते युद्धे कथं जीवेत् मादृशः॥ ८०॥ सर्वथाहमनुप्राप्तः सुकृच्छ्रं त्वयि जीवति। इस अनन्त सैन्यसमुद्रमें डूबकर अर्जुन अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देगा। युद्धमें उसके मारे जानेपर मेरे-जैसा मनुष्य कैसे जीवित रह सकता है? युयुधान! तुम्हारे जीते-जी मैं सब प्रकारसे बड़े भारी संकटमें पड़ गया हूँ॥ ८० १/२॥ श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयश्च पाण्डवः॥ ८१॥ लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च प्रविष्टस्तात भारतीम्। सूर्योदये महाबाहुर्दिवसश्चातिवर्तते॥ ८२॥ निद्राविजयी पाण्डुकुमार अर्जुन श्यामवर्णवाला दर्शनीय तरुण है। वह शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाता और विचित्र रीतिसे युद्ध करता है। तात! उस महाबाहु वीरने सूर्योदयके समय अकेले ही कौरवी-सेनामें प्रवेश किया था और अब दिन बीतता चला जा रहा है॥ ८१-८२॥ तन्न जानामि वार्ष्णेय यदि जीवति वा न वा। कुरूणां चापि तत् सैन्यं सागरप्रतिमं महत्॥ ८३॥ एक एव च बीभत्सुः प्रविष्टस्तात भारतीम्। अविषह्यां महाबाहुः सुरैरपि महाहवे॥ ८४॥ वार्ष्णेय! पता नहीं, इस समयतक अर्जुन जीवित है या नहीं। महासमरमें जिसके वेगको सहन करना देवताओंके लिये भी असम्भव है, कौरवोंकी वह सेना समुद्रके समान विशाल है, तात! उस कौरवी-सेनामें महाबाहु अर्जुनने अकेले ही प्रवेश किया है॥ ८३-८४॥ न हि मे वर्तते बुद्धिरद्य युद्धे कथंचन। द्रोणोऽपि रभसो युद्धे मम पीडयते बलम्॥ ८५॥ आज किसी प्रकार मेरी बुद्धि युद्धमें नहीं लग रही है। इधर द्रोणाचार्य भी युद्धस्थलमें बड़े वेगसे आक्रमण करके मेरी सेनाको पीड़ित कर रहे हैं॥ ८५॥ प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथासौ चरति द्विजः। युगपच्च समेतानां कार्याणां त्वं विचक्षणः॥ ८६॥