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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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महाबाहो! विप्रवर द्रोणाचार्य जैसा कार्य कर रहे हैं, वह सब तुम्हारी आँखोंके सामने है। एक ही समय प्राप्त हुए अनेक कार्योंमेंसे किसका पालन आवश्यक है, इसका निर्णय करनेमें तुम कुशल हो॥ ८६॥ महार्थं लघुसंयुक्तं कर्तुमर्हसि मानद। तस्य मे सर्वकार्येषु कार्यमेतन्मतं महत्॥ ८७॥ अर्जुनस्य परित्राणं कर्तव्यमिति संयुगे। मानद! सबसे महान् प्रयोजनको तुम्हें शीघ्रतापूर्वक सम्पन्न करना चाहिये। मुझे तो सब कार्योंमें सबसे महान् कार्य यही जान पड़ता है कि युद्धस्थलमें अर्जुनकी रक्षा की जाय॥ ८७ १/२॥ नाहं शोचामि दाशार्हं गोप्तारं जगतः पतिम्॥ ८८॥ स हि शक्तो रणे तात त्रींल्लोकानपि संगतान्। विजेतुं पुरुषव्याघ्रः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ८९॥ किं पुनर्धार्तराष्ट्रस्य बलमेतत् सुदुर्बलम्। तात! मैं दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके लिये शोक नहीं करता। वे तो सम्पूर्ण जगत्के संरक्षक और स्वामी हैं। युद्धस्थलमें तीनों लोक संगठित होकर आ जायँ तो भी वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण उन सबको परास्त कर सकते हैं, यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ। फिर दुर्योधनकी इस अत्यन्त दुर्बल सेनाको जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ८८-८९ १/२॥ अर्जुनस्त्वेष वार्ष्णेय पीडितो बहुभिर्युधि॥ ९०॥ प्रजह्यात् समरे प्राणांस्तस्माद् विन्दामि कश्मलम्। परंतु वार्ष्णेय! यह अर्जुन तो युद्धस्थलमें बहुसंख्यक सैनिकोंद्वारा पीड़ित होनेपर समरांगणमें अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा। इसीलिये मैं शोक और दुःखमें डूबा जा रहा हूँ॥ ९० १/२॥ तस्य त्वं पदवीं गच्छ गच्छेयुस्त्वादृशा यथा॥ ९१॥ तादृशस्येदृशे काले मादृशेनाभिनोदितः। अतः तुम मेरे-जैसे मनुष्यसे प्रेरित हो ऐसे संकटके समय अर्जुन-जैसे प्रिय सखाके पथका अनुसरण करो, जैसा कि तुम्हारे-जैसे वीर पुरुष किया करते हैं॥ ९१ १/२॥ रणे वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथी स्मृतौ॥ ९२॥ प्रद्युम्नश्च महाबाहुस्त्वं च सात्वत विश्रुतः। सात्वत! वृष्णिवंशी प्रमुख वीरोंमें रणक्षेत्रके लिये दो ही व्यक्ति अतिरथी माने गये हैं—एक तो महाबाहु प्रद्युम्न और दूसरे सुविख्यात वीर तुम॥ ९२ १/२॥ अस्त्रे नारायणसमः संकर्षणसमो बले॥ ९३॥ वीरतायां नरव्याघ्र धनंजयसमो ह्यसि।