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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 738 of 3237

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Page 738

नरव्याघ्र! तुम अस्त्रविद्याके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णके समान, बलमें बलरामजीके तुल्य और वीरतामें धनंजयके समान हो ॥ ९३ १/२ ॥
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य सर्वयुद्धविशारदम् ॥ ९४ ॥
त्वामेव पुरुषव्याघ्रं लोके सन्तः प्रचक्षते ।
इस जगत्में भीष्म और द्रोणके बाद तुझ पुरुषसिंह सात्यकिको ही श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण युद्धकलामें निपुण बताते हैं ॥ ९४ १/२ ॥
(सदेवासुरगन्धर्वान् सकिन्नरमहोरगान् ।
योधयेत् स जगत् सर्वं विजयेत रिपून् बहून् ॥
इति ब्रुवन्ति लोकेषु जनास्तव गुणान् सदा ।
समागमेषु जल्पन्ति पृथगेव च सर्वदा ॥)
जब अच्छे पुरुषोंका समाज जुटता है, उस समय उसमें आये हुए सब लोग संसारमें तुम्हारे गुणोंको सदा-सर्वदा सबसे विलक्षण ही बतलाते हैं। उनका कहना है कि सात्यकि देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर तथा बड़े-बड़े नागोंसहित बहुसंख्यक शत्रुओंपर विजय पा सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्से अकेले ही युद्ध कर सकते हैं।
नाशक्यं विद्यते लोके सात्यकेरिति माधव ॥ ९५ ॥
तत् त्वां यदभिवक्ष्यामि तत् कुरुष्व महाबल ।
सम्भावना हि लोकस्य मम पार्थस्य चोभयोः ॥ ९६ ॥
नान्यथा तां महाबाहो सम्प्रकर्तुमर्हसि ।
परित्यज्य प्रियान् प्राणान् रणे चर विभीतवत् ॥ ९७ ॥
माधव! लोग कहते हैं कि संसारमें सात्यकिके लिये कोई कार्य असाध्य नहीं है। महाबली वीर! सब लोगोंकी तथा मेरी और अर्जुनकी—दोनों भाइयोंकी तुम्हारे विषयमें बड़ी उत्तम भावना है। अतः मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसका पालन करो। महाबाहो! तुम हमारी पूर्वोक्त धारणाको बदल न देना। समरांगणमें प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर निर्भयके समान विचरो ॥ ९५—९७ ॥
न हि शैनेय दाशार्हा रणे रक्षन्ति जीवितम् ।
अयुद्धमनवस्थानं संग्रामे च पलायनम् ॥ ९८ ॥
भीरूणामसतां मार्गो नैष दाशार्हसेवितः ।
शैनेय! दशार्हकुलके वीर पुरुष रणक्षेत्रमें अपने प्राण बचानेकी चेष्टा नहीं करते हैं। युद्धसे मुँह मोड़ना, युद्धस्थलमें डटे न रहना और संग्रामभूमिमें पीठ दिखाकर भागना यह कायरों और अधम पुरुषोंका मार्ग है। दशार्हकुलके वीर पुरुष इससे दूर रहते हैं ॥ ९८ १/२ ॥
तवार्जुनो गुरुस्तात धर्मात्मा शिनिपुङ्गव ॥ ९९ ॥
वासुदेवो गुरुश्चापि तव पार्थस्य धीमतः ।