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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 742 of 3237

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Page 742

'ऐसी अवस्थामें नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरकी रक्षाका सारा भार तुमपर ही रखकर आज मैं सिन्धुराजके वधके लिये जाऊँगा ।। १५ ।। जयद्रथं च हत्वाहं द्रुतमेष्यामि माधव । धर्मराजं न चेद् द्रोणो निगृह्णीयाद् रणे बलात् ।। १६ ।। 'माधव! यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें धर्मराजको बलपूर्वक बंदी न बना सकें तो मैं जयद्रथका वध करके शीघ्र ही लौट आऊँगा ।। १६ ।। निगृहीते नरश्रेष्ठे भारद्वाजेन माधव । सैन्धवस्य वधो न स्यान्ममाप्रीतिस्तथा भवेत् ।। १७ ।। 'मधुवंशी वीर! यदि द्रोणाचार्यने नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको कैद कर लिया तो सिन्धुराजका वध नहीं हो सकेगा और मुझे भी महान् दुःख होगा ।। १७ ।। एवंगते नरश्रेष्ठे पाण्डवे सत्यवादिनि । अस्माकं गमनं व्यक्तं वनं प्रति भवेत् पुनः ।। १८ ।। 'यदि सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डुकुमार युधिष्ठिर इस प्रकार बंदी बनाये गये तो निश्चय ही हमें पुनः वनमें जाना पड़ेगा ।। १८ ।। सोऽयं मम जयो व्यक्तं व्यर्थ एव भविष्यति । यदि द्रोणो रणे क्रुद्धो निगृह्णीयाद् युधिष्ठिरम् ।। १९ ।। 'यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें कुपित होकर युधिष्ठिरको कैद कर लेंगे तो मेरी यह विजय अवश्य ही व्यर्थ हो जायगी ।। १९ ।। स त्वमद्य महाबाहो प्रियार्थं मम माधव । जयार्थं च यशोऽर्थं च रक्ष राजानमाहवे ।। २० ।। 'महाबाहु माधव! इसलिये तुम आज मेरा प्रिय करने, मुझे विजय दिलाने और मेरे यशकी वृद्धि करनेके लिये युद्धस्थलमें राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो' ।। २० ।। स भवान् मयि निक्षेपो निक्षिप्तः सव्यसाचिना । भारद्वाजाद् भयं नित्यं मन्यमानेन वै प्रभो ।। २१ ।। 'प्रभो! इस प्रकार द्रोणाचार्यसे निरन्तर भय मानते हुए सव्यसाची अर्जुनने आपको मेरे पास धरोहरके रूपमें रख छोड़ा है ।। २१ ।। तस्यापि च महाबाहो नित्यं पश्यामि संयुगे । नान्यं हि प्रतियोद्धारं रौक्मिणेयादृते प्रभो ।। २२ ।। 'महाबाहो! प्रभो! मैं प्रतिदिन युद्धस्थलमें रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नके सिवा दूसरे किसी वीरको ऐसा नहीं देखता जो द्रोणाचार्यके सामने खड़ा होकर उनसे युद्ध कर सके ।। २२ ।। मां चापि मन्यते युद्धे भारद्वाजस्य धीमतः । सोऽहं सम्भावनां चैतामाचार्यवचनं च तत् ।। २३ ।। पृष्ठतो नोत्सहे कर्तुं त्वां वा त्यक्तुं महीपते ।