महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context‘अर्जुन मुझे भी बुद्धिमान् द्रोणाचार्यका सामना करनेमें समर्थ योद्धा मानते हैं। महीपते! मैं अपने आचार्यकी इस सम्भावनाको तथा उनके उस आदेशको न तो पीछे ढकेल सकता हूँ और न आपको ही त्याग सकता हूँ ।। २३ १/२ ।।
आचार्यो लघुहस्तत्वादभेद्यकवचावृतः ।। २४ ।। उपलभ्य रणे क्रीडेद् यथा शकुनिना शिशुः ।
‘द्रोणाचार्य अभेद्य कवचसे सुरक्षित हैं। वे शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेके कारण रणक्षेत्रमें अपने विपक्षीको पाकर उसी प्रकार क्रीड़ा करते हैं, जैसे कोई बालक पक्षीके साथ खेल रहा हो ।। २४ १/२ ।।
यदि कार्ष्णिर्धनुष्पाणिर्हि स्यान्मकरध्वजः ।। २५ ।। तस्मै त्वां विसृजेयं वै स त्वां रक्षेद् यथार्जुनः ।
‘यदि कामदेवके अवतार श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न यहाँ हाथमें धनुष लेकर खड़े होते तो उन्हें मैं आपको सौंप देता। वे अर्जुनके समान ही आपकी रक्षा कर सकते थे ।। २५ १/२ ।।
कुरु त्मात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि ।। २६ ।। यः प्रतीयाद् रणे द्रोणं यावद् गच्छामि पाण्डवम् ।
‘आप पहले अपनी रक्षाकी व्यवस्था कीजिये। मेरे चले जानेपर कौन आपका संरक्षण करनेवाला है, जो रणक्षेत्रमें तबतक द्रोणाचार्यका सामना करता रहे जबतक कि मैं अर्जुनके पास जाता (और लौटता) हूँ ।। २६ १/२ ।।
मा च ते भयमद्यास्तु राजन्नर्जुनसम्भवम् ।। २७ ।। न स जातु महाबाहुर्भारमुद्यम्य सीदति ।
‘महाराज! आज आपके मनमें अर्जुनके लिये भय नहीं होना चाहिये। वे महाबाहु किसी कार्यभारको उठा लेनेपर कभी शिथिल नहीं होते हैं ।। २७ १/२ ।।
ये च सौवीरका योधास्तथा सैन्धवपौरवाः ।। २८ ।। उदीच्या दाक्षिणात्याश्च ये चान्येऽपि महारथाः । ये च कर्णमुखा राजन् रथोदाराः प्रकीर्तिताः ।। २९ ।। एतेऽर्जुनस्य क्रुद्धस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
‘राजन्! जो सौवीर, सिन्धु तथा पुरुदेशके योद्धा हैं, जो उत्तर और दक्षिणके निवासी एवं अन्य महारथी हैं तथा जो कर्ण आदि श्रेष्ठ रथी बताये गये हैं वे कुपित हुए अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं ।।
उद्युक्ता पृथिवी सर्वा ससुरासुरमानुषा ।। ३० ।। सराक्षसगणा राजन् सकिन्नरमहोरगा । जङ्गमाः स्थावराः सर्वे नालं पार्थस्य संयुगे ।। ३१ ।।