महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेयः पुरुषस्य हि ।
बन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽथवा पुनः ॥ १ ॥
त्वं हि नः परमो वक्ता लोकेऽस्मिन् भरतर्षभ ।
एतद् भवन्तं पृच्छामि तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भूपाल! जो मनुष्य बन्धु-बान्धवोंका अथवा राज्यका नाश हो जानेपर घोर संकटमें पड़ गया हो, उसके कल्याणका क्या उपाय है? भरतश्रेष्ठ! इस संसारमें आप ही हमारे लिये सबसे श्रेष्ठ वक्ता हैं; इसलिये यह बात आपसे ही पूछता हूँ। आप यह सब मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥
भीष्म उवाच
पुत्रदारैः सुखैश्चैव वियुक्तस्य धनेन वा ।
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे धृतिः श्रेयस्करी नृप ॥ ३ ॥
धैर्येण युक्तस्य सतः शरीरं न विशीर्यते ।
भीष्मजीने कहा— राजा युधिष्ठिर! जिसके स्त्री-पुत्र मर गये हों, सुख छिन गया हो अथवा धन नष्ट हो गया हो और इन कारणोंसे जो कठिन विपत्तिमें फँस गया हो, उसका तो धैर्य धारण करनेमें ही कल्याण है। जो धैर्यसे युक्त है, उस सत्पुरुषका शरीर चिन्ताके कारण नष्ट नहीं होता ॥ ३ १/२ ॥
विशोकता सुखं धत्ते धत्ते चारोग्यमुत्तमम् ॥ ४ ॥
आरोग्याच्च शरीरस्य स पुनर्विन्दते श्रियम् ।
शोकहीनता सुख और उत्तम आरोग्यका उत्पादन करती है, शरीरके नीरोग होनेसे मनुष्य फिर धन-सम्पत्तिका उपार्जन कर लेता है ॥ ४ १/२ ॥
यच्च प्राज्ञो नरस्तात सात्त्विकीं वृत्तिमास्थितः ॥ ५ ॥
तस्यैश्वर्यं च धैर्यं च व्यवसायश्च कर्मसु ।
तात! जो बुद्धिमान् मनुष्य सदा सात्त्विक वृत्तिका सहारा लिये रहता है। उसीको ऐश्वर्य और धैर्यकी प्राप्ति होती है तथा वही सम्पूर्ण कर्मोंमें उद्योगशील होता है ॥ ५ १/२ ॥