भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1488, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1488

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।। ६ ।। बलिवासवसंवादं पुनरेव युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! इस विषयमें पुनः बलि और इन्द्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।।

वृत्ते देवासुरे युद्धे दैत्यदानवसंक्षये ।। ७ ।। विष्णुक्रान्तेषु लोकेषु देवराजे शतक्रतौ । इज्यमानेषु देवेषु चातुर्वर्ण्ये व्यवस्थिते ।। ८ ।। समृद्धमात्रे त्रैलोक्ये प्रीतियुक्ते स्वयम्भुवि । पूर्वकालमें जब दैत्यों और दानवोंका संहार करनेवाला देवासुर-संग्राम समाप्त हो गया, वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने अपने पैरोंसे तीनों लोकोंको नाप लिया और सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले इन्द्र जब देवताओंके राजा हो गये, तब देवताओंकी सब ओर आराधना होने लगी। चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने धर्ममें स्थित रहने लगे। तीनों लोकोंका अभ्युदय होने लगा और सबको सुखी देखकर स्वयम्भू ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न रहने लगे ।।

रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यामपि चर्षिभिः ।। ९ ।। गन्धर्वैर्भुजगेन्द्रैश्च सिद्धैश्चान्यैर्वृतः प्रभुः । चतुर्दन्तं सुदान्तं च वारणेन्द्रं श्रिया वृतम् । आरुह्यैरावतं शक्रस्त्रैलोक्यमनुसंययौ ।। १० ।। उन्हीं दिनोंकी बात है, देवराज इन्द्र अपने ऐरावत नामक गजराजपर, जो चार सुन्दर दाँतोंसे सुशोभित और दिव्य शोभासे सम्पन्न था, आरूढ़ हो तीनों लोकोंमें भ्रमण करनेके लिये निकले। उस समय त्रिलोकीनाथ इन्द्र रुद्र, वसु, आदित्य, अश्विनीकुमार, ऋषिगण, गन्धर्व, नाग, सिद्ध तथा विद्याधरों आदिसे घिरे हुए थे ।। ९-१० ।।

स कदाचित् समुद्रान्ते कस्मिंश्चिद् गिरिगह्वरे । बलिं वैरोचनं वज्री ददर्शोपससर्प च ।। ११ ।। घूमते-घूमते वे किसी समय समुद्रतटपर जा पहुँचे। वहाँ किसी पर्वतकी गुफामें उन्हें विरोचनकुमार बलि दिखायी दिये। उन्हें देखते ही इन्द्र हाथमें वज्र लिये उनके पास जा पहुँचे ।। ११ ।।

तमैरावतमूर्धस्थं प्रेक्ष्य देवगणैर्वृतम् । सुरेन्द्रमिन्द्रं दैत्येन्द्रो न शुशोच न विव्यथे ।। १२ ।। देवताओंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रको ऐरावतकी पीठपर बैठे देख दैत्यराज बलिके मनमें तनिक भी शोक या व्यथा नहीं हुई ।। १२ ।।

दृष्ट्वा तमविकारस्थं तिष्ठन्तं निर्भयं बलिम् । अधिरूढो द्विपश्रेष्ठमित्युवाच शतक्रतुः ।। १३ ।।

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