महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1489, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्हें निर्भय और निर्विकार होकर खड़ा देख श्रेष्ठ गजराजपर चढ़े हुए शतक्रतु इन्द्रने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥
दैत्य न व्यथसे शौर्यादथवा वृद्धसेवया । तपसा भावितत्वाद् वा सर्वथैतत् सुदुष्करम् ॥ १४ ॥ ‘दैत्य! तुम्हें अपने शत्रु की समृद्धि देखकर व्यथा क्यों नहीं होती? क्या शौर्यसे अथवा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेसे या तपस्यासे अन्तःकरण शुद्ध हो जानेके कारण तुम्हें शोक नहीं होता है? साधारण पुरुषके लिये तो यह धैर्य सर्वथा परम दुष्कर है ॥ १४ ॥
शत्रुभिर्वशमानीतो हीनः स्थानादनुत्तमात् । वैरोचने किमाश्रित्य शोचितव्ये न शोचसि ॥ १५ ॥ ‘विरोचनकुमार! तुम शत्रुओंके वशमें पड़े और उत्तम स्थान (राज्य) से भ्रष्ट हुए—इस प्रकार शोचनीय दशामें पड़कर भी तुम किस बलका सहारा लेकर शोक नहीं करते हो? ॥ १५ ॥
श्रैष्ठ्यं प्राप्य स्वजातीनां महाभोगाननुत्तमान् । हृतस्वरत्नराज्यस्त्वं ब्रूहि कस्मान्न शोचसि ॥ १६ ॥ ‘तुमने अपने जाति-भाइयोंमें सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया था और परम उत्तम महान् भोगोंपर अधिकार जमा रखा था; किंतु इस समय तुम्हारे रत्न और राज्यका अपहरण हो गया है, तो भी बताओ, तुम्हें शोक क्यों नहीं होता है? ॥ १६ ॥
ईश्वरो हि पुरा भूत्वा पितृपैतामहे पदे । तत्त्वमद्य हृतं दृष्ट्वा सपत्नैः किं न शोचसि ॥ १७ ॥ ‘पहले तो तुम अपने बाप-दादोंके राज्यपर बैठकर तीनों लोकोंके ईश्वर बने हुए थे। अब उस राज्यको शत्रुओंने छीन लिया; यह देखकर भी तुम्हें शोक क्यों नहीं होता है? ॥ १७ ॥
बद्धश्व वारुणैः पाशैर्वज्रेण च समाहतः । हृतदारो हृतधनो ब्रूहि कस्मान्न शोचसि ॥ १८ ॥ ‘तुम्हें वरुणके पाशसे बाँधा गया, वज्रसे घायल किया गया तथा तुम्हारी स्त्री और धनका भी अपहरण कर लिया गया; फिर भी बोलो, तुम्हें शोक कैसे नहीं होता है? ॥
नष्टश्रीर्विभवभ्रष्टो यन्न शोचसि दुष्करम् । त्रैलोक्यराज्यनाशे हि कोऽन्यो जीवितुमुत्सहेत् ॥ १९ ॥ ‘तुम्हारी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तुम अपने धन-वैभवसे हाथ धो बैठे। इतनेपर भी जो तुम्हें शोक नहीं होता है, यह दूसरोंके लिये बड़ा कठिन है। तीनों लोकोंका राज्य नष्ट हो जानेपर भी तुम्हारे सिवा दूसरा कौन जीवित रहनेके लिये उत्साह दिखा सकता है? ॥
एतच्चान्यच्च परुषं ब्रुवन्तं परिभूय तम् । श्रुत्वा सुखमसम्भ्रान्तो बलिर्वैरोचनोऽब्रवीत् ॥ २० ॥