महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंये तथा और भी बहुत-सी कठोर बातें सुनाकर इन्द्रने बलिका तिरस्कार किया। विरोचनकुमार बलिने वे सारी बातें बड़े आनन्दसे सुन लीं और मनमें तनिक भी घबराहट न लाकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया।।
बलिरुवाच
निगृहीते मयि भृशं शक्र किं कत्थितेन ते । वज्रमुद्यम्य तिष्ठन्तं पश्यामि त्वां पुरंदर ॥ २१ ॥ बलिने कहा—इन्द्र! जब मैं शत्रुओं अथवा कालके द्वारा भलीभाँति बन्दी बना लिया गया हूँ, तब मेरे सामने इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? पुरंदर! मैं देखता हूँ, आज तुम वज्र उठाये मेरे सामने खड़े हो ॥ २१ ॥
अशक्तः पूर्वमासीस्त्वं कथञ्चिच्छक्ततां गतः । कस्त्वदन्य इमां वाचं सुक्रूरां वक्तुमर्हति ॥ २२ ॥ किंतु पहले तुममें ऐसा करनेकी शक्ति नहीं थी। अब किसी तरह शक्ति आ गयी है। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा अत्यन्त क्रूर वचन कह सकता है? ॥ २२ ॥
यस्तु शत्रोर्वशस्थस्य शक्तोऽपि कुरुते दयाम् । हस्तप्राप्तस्य वीरस्य तं चैव पुरुषं विदुः ॥ २३ ॥ जो शक्तिशाली होकर भी अपने वशमें पड़े हुए अथवा हाथमें आये हुए वीर शत्रुपर दया करता है, उसे अच्छे लोग उत्तम पुरुष मानते हैं ॥ २३ ॥
अनिश्चयो हि युद्धेषु द्वयोर्विवदमानयोः । एकः प्राप्नोति विजयमेकश्चैव पराजयम् ॥ २४ ॥ जब दो व्यक्तियोंमें विवाद एवं युद्ध छिड़ जाता है, तब किसकी जीत होगी—इसका कोई निश्चय नहीं रहता है। उनमेंसे एक पक्ष विजयी होता है और दूसरेको पराजय प्राप्त होती है ॥ २४ ॥
मा च तेऽभूत् स्वभावोऽयमिति ते देवपुङ्गव । ईश्वरः सर्वभूतानां विक्रमेण जितो बलात् ॥ २५ ॥ इसलिये देवराज! तुम्हारा स्वभाव ऐसा न हो, तुम ऐसा न समझ लो कि मैंने अपने बल और पराक्रमसे ही समस्त प्राणियोंके स्वामी मुझ बलिपर विजय पायी है ॥ २५ ॥
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र कृतं त्वया । यत् त्वमेवंगतो वज्रिन् यद्वाप्येवंगता वयम् ॥ २६ ॥ वज्रधारी इन्द्र! आज जो तुम इस प्रकार राज-वैभवसे सम्पन्न हो अथवा हमलोग जो इस दीन दशाको पहुँच गये हैं, यह सब न तो तुम्हारा किया हुआ है और न हमारा ही किया हुआ है ॥ २६ ॥
अहमासं यथाद्य त्वं भविता त्वं यथा वयम् ।