महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1491, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमावमंस्था मया कर्म दुष्कृतं कृतमित्युत ॥ २७ ॥
आज जैसे तुम हो, कभी मैं भी ऐसा ही था और इस समय जिस दशामें हमलोग पड़े हुए हैं, कभी तुम्हारी भी वैसी ही अवस्था होगी; अतः तुम यह समझकर कि मैंने बड़ा दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, मेरा अपमान न करो ॥ २७ ॥
सुखदुःखे हि पुरुषः पर्यायेणाधिगच्छति ।
पर्यायेणासि शक्रत्वं प्राप्तः शक्र न कर्मणा ॥ २८ ॥
प्रत्येक पुरुष बारी-बारीसे सुख और दुःख पाता है। इन्द्र! तुम भी अपने पराक्रमसे नहीं, कालक्रमसे ही इन्द्रपदको प्राप्त हुए हो ॥ २८ ॥
कालःकाले नयति मां त्वां च कालो नयत्ययम् ।
तेनाहं त्वं यथा नाद्य त्वं चापि न यथा वयम् ॥ २९ ॥
काल ही मुझे कुसमयकी ओर ले जा रहा है और यह काल ही तुम्हें अच्छे दिन दिखा रहा है; इसलिये आज जैसे तुम हो, वैसा मैं नहीं हूँ और जैसे हमलोग हैं, वैसे तुम नहीं हो ॥ २९ ॥
न मातृपितृशुश्रूषा न च दैवतपूजनम् ।
नान्यो गुणसमाचारः पुरुषस्य सुखावहः ॥ ३० ॥
माता-पिताकी सेवा, देवताओंकी पूजा तथा अन्य सद्गुणयुक्त सदाचार भी बुरे दिनोंमें किसी पुरुषके लिये सुखदायक नहीं होता है ॥ ३० ॥
न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न बान्धवाः ।
शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ॥ ३१ ॥
कालसे पीड़ित हुए मनुष्यको न विद्या, न तप, न दान, न मित्र और न बन्धु-बान्धव ही कष्टसे बचा पाते हैं ॥
नागामिनमनर्थं हि प्रतिघातशतैरपि ।
शक्नुवन्ति प्रतियोद्धुमृते बुद्धिबलान्नराः ॥ ३२ ॥
मनुष्य बुद्धि-बलके सिवा और किसी उपायसे सैकड़ों आघात करके भी आनेवाले अनर्थको नहीं रोक सकते ॥ ३२ ॥
पर्यायैर्हन्यमानानां परित्राता न विद्यते ।
इदं तु दुःखं यच्छक्र कर्ताहमिति मन्यसे ॥ ३३ ॥
कालक्रमसे जिनपर आघात होता है—स्वयं काल जिन्हें पीड़ा देता है, उनकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। शक्र! तुम जो अपनेको इस परिस्थितिका कर्ता मानते हो, यही तुम्हारे लिये दुःखकी बात है ॥ ३३ ॥
यदि कर्ता भवेत् कर्ता न क्रियेत कदाचन ।
यस्मात्तु क्रियते कर्ता तस्मात् कर्ताप्यनीश्वरः ॥ ३४ ॥