महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextदेता है ।। ५७ ।। पृच्छतस्ते मया तात श्रेय एतदुदाहृतम् । न हि शक्यं प्रधानेन श्रेयः संख्यातुमात्मनः ।। ५८ ।। तात! मैंने तुम्हारे प्रश्नके अनुसार यह श्रेयोमार्गका वर्णन किया है। पूर्णतया तो आत्मकल्याणकी परिगणना हो ही नहीं सकती ।। ५८ ।। एवं प्रवर्तमानस्य वृत्तिं प्राणिहितात्मनः । तपसैवेह बहुलं श्रेयो व्यक्तं भविष्यति ।। ५९ ।। जो इस प्रकारकी वृत्तिसे रहकर जीविका चलाता है और प्राणियोंके हितमें मन लगाये रहता है, उस पुरुषको स्वधर्मरूप तपके अनुष्ठानसे इस लोकमें ही परम कल्याणकी प्रत्यक्ष उपलब्धि हो जायगी ।। ५९ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि श्रेयोवाचिको नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रेयोमार्गका प्रतिपादन नामक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८७ ।।