महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1901, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अरिष्टनेमिका राजा सगरको वैराग्योत्पादक मोक्षविषयक उपदेश
युधिष्ठिर उवाच
कथं नु युक्तः पृथिवीं चरेदस्मद्विधो नृपः ।
नित्यं कैश्च गुणैर्युक्तः संगपाशाद् विमुच्यते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— दादाजी! मेरे-जैसा राजा कैसे साधन और व्यवहारसे युक्त होकर पृथ्वीपर विचरे और सदा किन गुणोंसे सम्पन्न होकर वह आसक्तिके बन्धनसे मुक्त हो? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
अरिष्टनेमिना प्रोक्तं सगरायानुपृच्छते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें राजा सगरके प्रश्न करनेपर अरिष्टनेमिने जो उत्तर दिया था, वह प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें बताऊँगा ॥ २ ॥
सगर उवाच
किं श्रेयः परमं ब्रह्मन् कृत्वेह सुखमश्नुते ।
कथं न शोचेन्न क्षुभ्येदेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
सगरने पूछा— ब्रह्मन्! इस जगत्में मनुष्य किस परम कल्याणकारी कर्मका अनुष्ठान करके सुखका भागी होता है? तथा किस उपायसे उसे शोक या क्षोभ प्राप्त नहीं होता? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तदा तार्क्ष्यः सर्वशास्त्रविदां वरः ।
विबुध्य सम्पदं चाग्र्यां सद्ध्वाक्यमिदमब्रवीत् ॥ ४ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! राजा सगरके इस प्रकार पूछनेपर सम्पूर्ण शास्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ तार्क्ष्य (अरिष्टनेमि)-ने उनमें सर्वोत्तम दैवी सम्पत्तिके गुण जानकर उनको इस प्रकार उत्तम उपदेश दिया— ॥ ४ ॥
सुखं मोक्षसुखं लोके न च मूढोऽवगच्छति ।
प्रसक्तः पुत्रपशुषु धनधान्यसमाकुलः ॥ ५ ॥