महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1902, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘सगर! संसारमें मोक्षका सुख ही वास्तविक सुख है, परंतु जो धनधान्यके उपार्जनमें व्यग्र तथा पुत्र और पशुओंमें आसक्त है, उस मूढ़ मनुष्यको उसका यथार्थ ज्ञान नहीं होता’ ॥ ५ ॥
सक्तबुद्धिरशान्तात्मा न शक्यं तच्चिकित्सितुम् ।
स्नेहपाशसितो मूढो न स मोक्षाय कल्पते ॥ ६ ॥
‘जिसकी बुद्धि विषयोंमें आसक्त है, जिसका मन अशान्त रहता है, ऐसे मनुष्यकी चिकित्सा करनी कठिन है; क्योंकि जो स्नेहके बन्धनमें बँधा हुआ है, वह मूढ़ मोक्ष पानेके लिये योग्य नहीं होता’ ॥ ६ ॥
स्नेहजानिह ते पाशान् वक्ष्यामि शृणु तान् मम ।
सकर्णकेन शिरसा शक्याः श्रोतुं विजानता ॥ ७ ॥
‘मैं तुम्हें स्नेहजनित बन्धनोंका परिचय देता हूँ, उन्हें तुम मुझसे सुनो। श्रवणेन्द्रियसम्पन्न समझदार मनुष्य ही ऐसी बातोंको बुद्धिपूर्वक सुन सकता है’ ॥ ७ ॥
सम्भाव्य पुत्रान् कालेन यौवनस्थान् निवेश्य च ।
समर्थान् जीवने ज्ञात्वा मुक्तश्चर यथासुखम् ॥ ८ ॥
‘समयानुसार पुत्रोंको उत्पन्न करके जब वे जवान हो जायँ, तब उनका विवाह कर दो और जब यह मालूम हो जाय कि अब ये दूसरेके सहयोगके बिना ही जीवन-निर्वाह करनेमें समर्थ हैं, तब उनके स्नेह-पाशसे मुक्त हो सुखपूर्वक विचरो’ ॥ ८ ॥
भार्यां पुत्रवतीं वृद्धां लालितां पुत्रवत्सलाम् ।
ज्ञात्वा प्रजहि कालेन परार्थमनुदृश्य च ॥ ९ ॥
‘पत्नी पुत्रवती होकर वृद्ध हो गयी। अब पुत्रगण उसका पालन करते हैं और वह भी पुत्रोंपर पूर्ण वात्सल्य रखती है, यह जानकर परम पुरुषार्थ मोक्षको अपना लक्ष्य बनाकर यथासमय उसका परित्याग कर दे’ ॥ ९ ॥
सापत्यो निरपत्यो वा मुक्तश्चर यथासुखम् ।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थांस्त्वमनुभूय यथाविधि ॥ १० ॥
कृतकौतूहलस्तेषु मुक्तश्चर यथासुखम् ।
‘शास्त्र-विधिके अनुसार इन्द्रियोंद्वारा इन्द्रियोंके विषयोंका अनुभव करके जब तुम उनके खेलको पूरा कर चुको, तब संतान हुई हो चाहे न हुई हो, उनसे मुक्त होकर सुखपूर्वक विचरो’ ॥ १० ½ ॥
उपपत्त्योपलब्धेषु लोकेषु च समो भव ॥ ११ ॥
‘दैवेच्छासे जो भी लौकिक पदार्थ उपलब्ध हों, उनमें समान भाव रखो—राग-द्वेष न करो’ ॥ ११ ॥
एष तावत् समासेन तव संकीर्तितो मया ।
मोक्षार्थो विस्तरेणाथ भूयो वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ १२ ॥