भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1903, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1903

'यह संक्षेपमें मैंने तुम्हें मोक्षका विषय बताया है। अब पुनः इसीको विस्तारके साथ बता रहा हूँ, सुनो ।। मुक्ता वीतभया लोके चरन्ति सुखिनो नराः । सक्तभावा विनश्यन्ति नरास्तत्र न संशयः ॥ १३ ॥ आहारसंचयाश्चैव तथा कीटपिपीलिकाः । असक्ताः सुखिनो लोके सक्ताश्चैव विनाशिनः ॥ १४ ॥ 'मुक्त पुरुष सुखी होते हैं और संसारमें निर्भय होकर विचरते हैं; किंतु जिनका चित्त विषयोंमें आसक्त होता है, वे कीड़े-मकोड़ोंकी भाँति आहारका संग्रह करते-करते ही नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है; अतः जो आसक्तिसे रहित हैं, वे ही इस संसारमें सुखी हैं। आसक्त मनुष्योंका तो नाश ही होता है' ॥ १३-१४ ॥ स्वजने न च ते चिन्ता कर्तव्या मोक्षबुद्धिना । इमे मया विनाभूता भविष्यन्ति कथं त्विति ॥ १५ ॥ 'यदि तुम्हारी बुद्धि मोक्षमें लगी हुई है तो तुम्हें स्वजनोंके विषयमें ऐसी चिन्ता नहीं करनी चाहिये कि ये मेरे बिना कैसे रहेंगे' ॥ १५ ॥ स्वयमुत्पद्यते जन्तुः स्वयमेव विवर्धते । सुखदुःखे तथा मृत्युं स्वयमेवाधिगच्छति ॥ १६ ॥ 'प्राणी स्वयं जन्म लेता है, स्वयं बढ़ता है और स्वयं ही सुख-दुःख तथा मृत्युको प्राप्त होता है' ॥ १६ ॥ भोजनाच्छादने चैव मात्रा पित्रा च संग्रहम् । स्वकृतेनाधिगच्छन्ति लोके नास्त्यकृतं पुरा ॥ १७ ॥ 'मनुष्य पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार ही भोजन, वस्त्र तथा अपने माता-पिताके द्वारा संग्रह किया हुआ धन प्राप्त करता है। संसारमें जो कुछ मिलता है, वह पूर्वकृत कर्मोंके फलके अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है' ।। धात्रा विहितभक्ष्याणि सर्वभूतानि मेदिनीम् । लोके विपरिधावन्ति रक्षितानि स्वकर्मभिः ॥ १८ ॥ 'संसारमें सभी प्राणी अपने कर्मोंसे सुरक्षित हो सारी पृथ्वीकी दौड़ लगाते हैं और विधाताने उनके प्रारब्धके अनुसार जो आहार नियत कर दिया है, उसे प्राप्त करते हैं' ॥ १८ ॥ स्वयं मृत्पिण्डभूतस्य परतन्त्रस्य सर्वदा । को हेतुः स्वजनं पोष्टुं रक्षितुं वादृढात्मनः ॥ १९ ॥ 'जो स्वयं ही शरीरकी दृष्टिसे मिट्टीका लोंदामात्र है, सर्वदा परतन्त्र है, वह अदृढ़ मनवाला मनुष्य स्वजनोंका पोषण और रक्षण करनेमें कैसे समर्थ हो सकता है?' ॥ १९ ॥ स्वजनं हि यदा मृत्युर्हन्त्येव तव पश्यतः ।

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