भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1904, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1904

कृतेऽपि यत्ने महति तत्र बोद्धव्यमात्मना ॥ २० ॥ ‘जब स्वजनोंको तुम्हारे देखते-देखते ही मौत मार ही डालती है और तुम उन्हें बचानेके लिये महान् प्रयत्न करनेपर भी सफल नहीं हो पाते, तब इस विषयमें तुम्हें स्वयं ही यह विचार करना चाहिये कि मेरी क्या शक्ति है?’ ॥ २० ॥ जीवन्तमपि चैवैनं भरणे रक्षणे तथा । असमाप्ते परित्यज्य पश्चादपि मरिष्यसि ॥ २१ ॥ ‘यदि वे स्वजन जीवित रह जायँ तो भी इनके भरण-पोषण और संरक्षणका कार्य समाप्त होनेसे पहले ही तुम इन्हें छोड़कर पीछे स्वयं भी तो मर जाओगे’ ॥ २१ ॥ यदा मृतं च स्वजनं न ज्ञास्यसि कदाचन । सुखितं दुःखितं वापि ननु बोद्धव्यमात्मना ॥ २२ ॥ ‘अथवा जब कोई स्वजन मरकर इस लोकसे चला जायगा, तब उसके विषयमें यह कभी नहीं जान सकोगे कि वह सुखी है या दुखी, अतः इस विषयमें तुम्हें स्वयं ही विचार करना चाहिये’ ॥ २२ ॥ मृते वा त्वयि जीवे वा यदा भोक्ष्यति वै जनः । स्वकृतं ननु बुद्ध्वैवं कर्तव्यं हितमात्मनः ॥ २३ ॥ ‘तुम जीवित रहो या मर जाओ। तुम्हारा प्रत्येक स्वजन जब अपनी-अपनी करनीका ही फल भोगेगा, तब इस बातको जानकर तुम्हें भी अपने कल्याणके लिये साधनमें लग जाना चाहिये’ ॥ २३ ॥ एवं विजान् लोकेऽस्मिन् कः कस्येत्यभिनिश्चितः । मोक्षे निवेशय मनो भूयश्चाप्युपधारय ॥ २४ ॥ ‘ऐसा जानकर इस संसारमें कौन किसका है, इस बातका भलीभाँति विचार करके अपने मनको मोक्षमें लगा दो और साथ ही पुनः इस बातपर ध्यान दो’ ॥ क्षुत्पिपासादयो भावा जिता यस्येह देहिनः । क्रोधो लोभस्तथा मोहः सत्त्ववान् मुक्त एव सः ॥ २५ ॥ ‘जिसने क्षुधा, पिपासा, क्रोध, लोभ और मोह आदि भावोंपर विजय पा ली है, वह सत्त्वसम्पन्न पुरुष सदा मुक्त ही है’ ॥ २५ ॥ द्यूते पाने तथा स्त्रीषु मृगयायां च यो नरः । न प्रमाद्यति सम्मोहात् सततं मुक्त एव सः ॥ २६ ॥ ‘जो मोहवश जूआ, मद्यपान, परस्त्रीसंसर्ग तथा मृगया आदि व्यसनोंमें आसक्त होनेका प्रमाद नहीं करता है, वह भी सदा मुक्त ही है’ ॥ २६ ॥ दिवसे दिवसे नाम रात्रौ रात्रौ पुमान् सदा । भोक्तव्यमिति यः खिन्नो दोषबुद्धिः स उच्यते ॥ २७ ॥