भारतकोश
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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

कृतेऽपि यत्ने महति तत्र बोद्धव्यमात्मना ॥ २० ॥ ‘जब स्वजनोंको तुम्हारे देखते-देखते ही मौत मार ही डालती है और तुम उन्हें बचानेके लिये महान् प्रयत्न करनेपर भी सफल नहीं हो पाते, तब इस विषयमें तुम्हें स्वयं ही यह विचार करना चाहिये कि मेरी क्या शक्ति है?’ ॥ २० ॥ जीवन्तमपि चैवैनं भरणे रक्षणे तथा । असमाप्ते परित्यज्य पश्चादपि मरिष्यसि ॥ २१ ॥ ‘यदि वे स्वजन जीवित रह जायँ तो भी इनके भरण-पोषण और संरक्षणका कार्य समाप्त होनेसे पहले ही तुम इन्हें छोड़कर पीछे स्वयं भी तो मर जाओगे’ ॥ २१ ॥ यदा मृतं च स्वजनं न ज्ञास्यसि कदाचन । सुखितं दुःखितं वापि ननु बोद्धव्यमात्मना ॥ २२ ॥ ‘अथवा जब कोई स्वजन मरकर इस लोकसे चला जायगा, तब उसके विषयमें यह कभी नहीं जान सकोगे कि वह सुखी है या दुखी, अतः इस विषयमें तुम्हें स्वयं ही विचार करना चाहिये’ ॥ २२ ॥ मृते वा त्वयि जीवे वा यदा भोक्ष्यति वै जनः । स्वकृतं ननु बुद्ध्वैवं कर्तव्यं हितमात्मनः ॥ २३ ॥ ‘तुम जीवित रहो या मर जाओ। तुम्हारा प्रत्येक स्वजन जब अपनी-अपनी करनीका ही फल भोगेगा, तब इस बातको जानकर तुम्हें भी अपने कल्याणके लिये साधनमें लग जाना चाहिये’ ॥ २३ ॥ एवं विजान् लोकेऽस्मिन् कः कस्येत्यभिनिश्चितः । मोक्षे निवेशय मनो भूयश्चाप्युपधारय ॥ २४ ॥ ‘ऐसा जानकर इस संसारमें कौन किसका है, इस बातका भलीभाँति विचार करके अपने मनको मोक्षमें लगा दो और साथ ही पुनः इस बातपर ध्यान दो’ ॥ क्षुत्पिपासादयो भावा जिता यस्येह देहिनः । क्रोधो लोभस्तथा मोहः सत्त्ववान् मुक्त एव सः ॥ २५ ॥ ‘जिसने क्षुधा, पिपासा, क्रोध, लोभ और मोह आदि भावोंपर विजय पा ली है, वह सत्त्वसम्पन्न पुरुष सदा मुक्त ही है’ ॥ २५ ॥ द्यूते पाने तथा स्त्रीषु मृगयायां च यो नरः । न प्रमाद्यति सम्मोहात् सततं मुक्त एव सः ॥ २६ ॥ ‘जो मोहवश जूआ, मद्यपान, परस्त्रीसंसर्ग तथा मृगया आदि व्यसनोंमें आसक्त होनेका प्रमाद नहीं करता है, वह भी सदा मुक्त ही है’ ॥ २६ ॥ दिवसे दिवसे नाम रात्रौ रात्रौ पुमान् सदा । भोक्तव्यमिति यः खिन्नो दोषबुद्धिः स उच्यते ॥ २७ ॥

'जो पुरुष सदा प्रत्येक दिन और प्रत्येक रात्रिमें भोग भोगने या भोजन करनेकी ही चिन्तामें पड़कर दुःखी रहता है, वह दोषबुद्धिसे युक्त कहलाता है' ।। २७ ।।

आत्मभावं तथा स्त्रीषु मुक्तमेव पुनः पुनः ।
यः पश्यति सदा युक्तो यथावन्मुक्त एव सः ।। २८ ।।
'जो सदा योगयुक्त रहकर स्त्रियोंके प्रति अपने भाव (अनुराग या आसक्ति)-को निवृत्त हुआ ही देखता है अर्थात् जिसकी स्त्रियोंके प्रति भोग्यबुद्धि नहीं होती, वही वास्तवमें मुक्त है' ।। २८ ।।

सम्भवं च विनाशं च भूतानां चेष्टितं तथा ।
यस्तत्त्वतो विजानाति लोकेऽस्मिन् मुक्त एव सः ।। २९ ।।
'जो प्राणियोंके जन्म, मृत्यु और चेष्टाओंको ठीक-ठीक जानता है, वह भी इस संसारमें मुक्त ही है' ।।

प्रस्थं वाहसहस्रेषु यात्रार्थं चैव कोटिषु ।
प्रासादे मञ्चकं स्थानं यः पश्यति स मुच्यते ।। ३० ।।
'जो हजारों और करोड़ों गाड़ी अन्नमेंसे केवल एक प्रस्थ (पेट भरने लायक)-को ही अपने जीवन-निर्वाहके लिये पर्याप्त समझता है (उससे अधिकका संग्रह करना नहीं चाहता) तथा बड़े-से-बड़े महलमें मञ्च बिछाने भरकी जगहको ही अपने लिये पर्याप्त समझता है, वह मुक्त हो जाता है' ।। ३० ।।

मृत्युनाभ्याहतं लोकं व्याधिभिश्चोपपीडितम् ।
अवृत्तिकर्शितं चैव यः पश्यति स मुच्यते ।। ३१ ।।
'जो इस जगत्‌को रोगोंसे पीड़ित, जीविकाके अभावसे दुर्बल और मृत्युके आघातसे नष्ट हुआ देखता है, वह मुक्त हो जाता है' ।। ३१ ।।

यः पश्यति स संतुष्टो न पश्यंश्च विहन्यते ।
यश्चाप्यल्पेन संतुष्टो लोकेऽस्मिन् मुक्त एव सः ।। ३२ ।।
'जो ऐसा देखता है, वह संतुष्ट एवं मुक्त होता है; किंतु जो ऐसा नहीं देखता, वह मारा जाता है—जन्म, मृत्युके चक्रमें पड़ा रहता है। जो थोड़ेसे लाभमें ही संतुष्ट रहता है, वह इस जगत्में मुक्त ही है' ।। ३२ ।।

अग्नीषोमाविदं सर्वमिति यश्चानुपश्यति ।
न च संस्पृश्यते भावैरद्भुतैर्मुक्त एव सः ।। ३३ ।।
'जो इस सम्पूर्ण जगत्‌को अग्नि और सोम (भोक्ता और भोज्य) रूप ही देखता है और स्वयंको उनसे भिन्न समझता है, उसे मायाके अद्भुत भाव—सुख-दुःख आदि छू नहीं सकते। वह सर्वथा मुक्त ही है' ।। ३३ ।।

पर्यङ्कशय्या भूमिश्च समाने यस्य देहिनः ।
शालयश्च कदन्नं च यस्य स्यान्मुक्त एव सः ।। ३४ ।।

'जिस देहधारीके लिये पलंगकी सेज और भूमि—दोनों समान है; जो अगहनीके चावल और कोदो आदिको एक-सा समझता है, वह मुक्त ही है' ।। ३४ ।।
क्षौमं च कुशचीरं च कौशेयं वल्कलानि च ।
आविकं चर्म च समं यस्य स्यान्मुक्त एव सः ।। ३५ ।।
'जिसके लिये सनके वस्त्र, कुशके चीर, रेशमी वस्त्र, वल्कल, ऊनी वस्त्र और मृगचर्म—सब समान हैं, वह भी मुक्त ही है' ।। ३५ ।।
पञ्चभूतसमुद्भूतं लोकं यश्चानुपश्यति ।
तथा च वर्तते दृष्ट्वा लोकेऽस्मिन् मुक्त एव सः ।। ३६ ।।
'जो संसारको पाञ्चभौतिक देखता और उस दृष्टिके अनुसार ही बर्ताव करता है, वह भी इस जगत्में मुक्त ही है' ।। ३६ ।।
सुखदुःखे समे यस्य लाभालाभौ जयाजयौ ।
इच्छाद्वेषौ भयोद्वेगौ सर्वथा मुक्त एव सः ।। ३७ ।।
'जिसकी दृष्टिमें सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय सम है तथा जिसके इच्छा-द्वेष, भय और उद्वेग सर्वथा नष्ट हो गये हैं, वही मुक्त है' ।। ३७ ।।
रक्तमूत्रपुरीषाणां दोषाणां संचयांस्तथा ।
शरीरं दोषबहुलं दृष्ट्वा चैव विमुच्यते ।। ३८ ।।
'यह शरीर क्या है, बहुत-से दोषोंका भण्डार। इसमें रक्त, मल-मूत्र तथा और भी अनेक दोषोंका संचय हुआ है। जो इस बातको देखता और समझता है, वह मुक्त हो जाता है' ।। ३८ ।।
वलीपलितसंयोगे कार्श्यं वैवर्ण्यमेव च ।
कुब्जभावं च जरया यः पश्यति स मुच्यते ।। ३९ ।।
'बुढ़ापा आनेपर इस शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं। सिरके बाल सफेद हो जाते हैं। देह दुबली-पतली एवं कान्तिहीन हो जाती है तथा कमर झुक जानेके कारण मुनष्य कुबड़ा-सा हो जाता है। इन सब बातोंकी ओर जिसकी सदा ही दृष्टि रहती है, वह मुक्त हो जाता है' ।। ३९ ।।
पुंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोपरमं तथा ।
बाधिर्यं प्राणमन्दत्वं यः पश्यति स मुच्यते ।। ४० ।।
'समय आनेपर पुरुषत्व नष्ट हो जाता है, आँखोंसे दिखायी नहीं देता है, कान बहरे हो जाते हैं और प्राणशक्ति अत्यन्त क्षीण हो जाती है। इन सब बातोंको जो सदा देखता और इनपर विचार करता रहता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है' ।। ४० ।।
गतान्ऋषींस्तथा देवानसुरांश्च तथा गतान् ।
लोकादस्मात् परं लोकं यः पश्यति स मुच्यते ।। ४१ ।।

‘कितने ही ऋषि देवता तथा असुर इस लोकसे परलोकको चले गये। जो सदा यह देखता और स्मरण रखता है वह मुक्त हो जाता है’ ।। ४१ ।।

प्रभावैरन्वितास्तैस्तैः पार्थिवेन्द्राः सहस्रशः ।
ये गताः पृथिवीं त्यक्त्वा इति ज्ञात्वा विमुच्यते ।। ४२ ।।
‘सहस्रों प्रभावशाली नरेश इस पृथिवीको छोड़कर कालके गालमें चले गये। इस बातको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है’ ।। ४२ ।।

अर्थांश्च दुर्भल्लाँल्लोके क्लेशांश्च सुलभांस्तथा ।
दुःखं चैव कुटुम्बार्थे यः पश्यति स मुच्यते ।। ४३ ।।
‘संसारमें धन दुर्लभ है और क्लेश सुलभ। कुटुम्बके पालन-पोषणके लिये भी जहाँ बहुत दुःख उठाना पड़ता है, यह सब जिसकी दृष्टिमें है, वह मुक्त हो जाता है’ ।। ४३ ।।

अपत्यानां च वैगुण्यं जनं विगुणमेव च ।
पश्यन् भूयिष्ठशो लोके को मोक्षं नाभिपूजयेत् ।। ४४ ।।
‘इतना ही नहीं, इस जगत्‌में अपनी संतानोंकी गुणहीनताका दुःख भी देखना पड़ता है। विपरीत गुणवाले मनुष्योंसे भी सम्बन्ध हो जाता है। इस प्रकार जो यहाँ अधिकांश कष्ट ही देखता है, ऐसा कौन मनुष्य मोक्षका आदर नहीं करेगा?’ ।। ४४ ।।

शास्त्राल्लोकाच्च यो बुद्धः सर्वं पश्यति मानवः ।
असारमिव मानुष्यं सर्वथा मुक्त एव सः ।। ४५ ।।
‘जो मनुष्य शास्त्रोंके अध्ययन तथा लौकिक अनुभवसे भी ज्ञानसम्पन्न होकर समस्त मानव-जगत्‌को सारहीन-सा देखता है, वह सब प्रकारसे मुक्त ही है’ ।। ४५ ।।

एतत् श्रुत्वा मम वचो भवांश्चरतु मुक्तवत् ।
गार्हस्थ्ये यदि वा मोक्षे कृता बुद्धिरविक्लवा ।। ४६ ।।
‘मेरे इस वचनको सुनकर तुम अपनी बुद्धिको व्याकुलतासे रहित बनाकर गृहस्थाश्रममें या संन्यास-आश्रममें चाहे जहाँ रहकर मुक्तकी भाँति आचरण करो’ ।।

तत् तस्य वचनं श्रुत्वा सम्यक् स पृथिवीपतिः ।
मोक्षजैश्च गुणैर्युक्तः पालयामास च प्रजाः ।। ४७ ।।
राजा सगर अरिष्टनेमिके उपर्युक्त उपदेशको भलीभाँति सुनकर मोक्षोपयोगी गुणोंसे सम्पन्न हो प्रजाका पालन करने लगे ।। ४७ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि
सगरारिष्टनेमिसंवादेऽष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सगर और अरिष्टनेमिका संवादविषयक दो सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८८ ।।

२८९-

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एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

भृगुपुत्र उशनाका चरित्र और उन्हें शुक्र नामकी प्राप्ति

युधिष्ठिर उवाच

तिष्ठते मे सदा तात कौतूहलमिदं हृदि ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुपितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—तात! कुरुकुलके पितामह! मेरे हृदयमें चिरकालसे यह एक कौतूहलपूर्ण प्रश्न खड़ा है, जिसका समाधान मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

कथं देवर्षिरुशना सदा काव्यो महामतिः ।
असुराणां प्रियकरः सुराणामप्रिये रतः ॥ २ ॥
परम बुद्धिमान् कवित्वसम्पन्न देवर्षि उशना क्यों सदा ही असुरोंका प्रिय तथा देवताओंका अप्रिय करनेमें लगे रहते हैं? ॥ २ ॥

वर्धयामास तेजश्च किमर्थममितौजसाम् ।
नित्यं वैरनिबद्धाश्च दानवाः सुरसत्तमैः ॥ ३ ॥
उन्होंने अमित तेजस्वी दानवोंका तेज किसलिये बढ़ाया? दानव तो सदा श्रेष्ठ देवताओंके साथ वैर ही बाँधे रहते हैं ॥ ३ ॥

कथं चाप्युशना प्राप शुक्रत्वममरद्युतिः ।
ऋद्धिं च स कथं प्राप्तः सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ४ ॥
देवोपम तेजस्वी मुनिवर उशनाका नाम शुक्र क्यों हो गया? उन्हें ऋद्धि कैसे प्राप्त हुई? यह सब मुझे बताइये ॥ ४ ॥

न याति च स तेजस्वी मध्येन नभसः कथम् ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं निखिलेन पितामह ॥ ५ ॥
पितामह! देवर्षि उशना हैं तो बड़े तेजस्वी; परंतु वे आकाशके बीचसे होकर क्यों नहीं जाते? इन सब बातोंको मैं पूर्णरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

शृणु राजन्नवहितः सर्वमेतद् यथातथम् ।
यथामति यथा चैतच्छ्रुतपूर्वं मयानघ ॥ ६ ॥
भीष्मजीने कहा—निष्पाप नरेश! मैंने इन सब बातोंको पहले जिस तरह सुन रखा है, वह सारा वृत्तान्त अपनी बुद्धिके अनुसार यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६ ॥

एष भार्गवदायादो मुनिर्मान्यो दृढव्रतः ।

सुराणां विप्रियकरो निमित्ते कारणात्मके ॥ ७ ॥
ये भृगुपुत्र मुनिवर उशना सबके लिये माननीय तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं। एक विशेष कारण बन जानेसे रुष्ट होकर ये देवताओंके विरोधी हो गये* ॥ ७ ॥

इन्द्रोऽथ धनदो राजा यक्षरक्षोऽधिपः सदा ।
प्रभविष्णुश्च कोशस्य जगतश्च तथा प्रभुः ॥ ८ ॥
उस समय इन्द्र तीनों लोकोंके अधीश्वर थे और सदा यक्षों तथा राक्षसोंके अधिपति प्रभावशाली जगत्पति राजा कुबेर उनके कोषाध्यक्ष बनाये गये थे ॥ ८ ॥

तस्यात्मानमथाविश्य योगसिद्धो महामुनिः ।
रुद्ध्वा धनपतिं देवं योगेन हृतवान् वसु ॥ ९ ॥
योगसिद्ध महामुनि उशनाने योगबलसे धनाध्यक्ष कुबेरके भीतर प्रवेश करके उन्हें अपने काबूमें कर लिया और उनके सारे धनका अपहरण कर लिया ॥ ९ ॥

हृते धने ततः शर्म न लेभे धनदस्तथा ।
आपन्नमन्युः संविग्नः सोऽभ्यगात् सुरसत्तमम् ॥ १० ॥
धनका अपहरण हो जानेपर कुबेरको चैन नहीं पड़ा। वे कुपित और उद्विग्न होकर देवेश्वर महादेवजीके पास गये ॥ १० ॥

निवेदयामास तदा शिवायामिततेजसे ।
देवश्रेष्ठाय रुद्राय सौम्याय बहुरूपिणे ॥ ११ ॥
उस समय उन्होंने अमित तेजस्वी अनेक रूपधारी सौम्य एवं शिवस्वरूप देवेश्वर रुद्रसे इस प्रकार निवेदन किया ॥ ११ ॥

योगात्मकेनोशनसा रुद्ध्वा मम हृतं वसु ।
योगेनात्मगतं कृत्वा निःसृतश्च महातपाः ॥ १२ ॥
‘प्रभो! महर्षि उशना योगबलसे सम्पन्न हैं। उन्होंने अपनी शक्तिसे मुझे बंदी बनाकर मेरा सारा धन हर लिया। वे महान् तपस्वी तो हैं ही, योगबलसे मुझे अपने अधीन करके अपना काम बनाकर निकल गये’ ॥ १२ ॥

एतच्छ्रुत्वा ततः क्रुद्धो महायोगी महेश्वरः ।
संरक्तनयनो राजन् शूलमादाय तस्थिवान् ॥ १३ ॥
राजन्! यह सुनकर महायोगी महेश्वर कुपित हो गये और लाल आँखें किये हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हो गये ॥ १३ ॥

क्वासौ क्वासविति प्राह गृहीत्वा परमायुधम् ।
उशना दूरतस्तस्य बभौ ज्ञात्वा चिकीर्षितम् ॥ १४ ॥
उस उत्तम अस्त्रको लेकर वे सहसा बोल उठे—‘कहाँ है, कहाँ है वह उशना?’ महादेवजी क्या करना चाहते हैं, यह जानकर उशना उनसे दूर हो गये ॥ १४ ॥

स महायोगिनो बुद्ध्वा तं रोषं वै महात्मनः ।
गतिमागमनं वेत्ति स्थानं चैव ततः प्रभुः ॥ १५ ॥
महायोगी महात्मा भगवान् शिवके उस रोषको समझकर वे उनसे दूर हट गये थे, योगसिद्ध उशना, गमन, आगमन और स्थानको जानते थे। अर्थात् कब हटना चाहिये, कब आना चाहिये, तथा किस अवस्थामें कहीं अन्यत्र न जाकर अपने स्थानपर ही ठहरे रहना चाहिये, इन सब बातोंको वे अच्छी तरह समझते थे ॥
संचिन्त्योग्रेण तपसा महात्मानं महेश्वरम् ।
उशना योगसिद्धात्मा शूलाग्रे प्रत्यदृश्यत ॥ १६ ॥
योगसिद्धात्मा उशना अपनी उग्र तपस्याद्वारा महात्मा महेश्वरका चिन्तन करके उनके त्रिशूलके अग्रभागमें दिखायी दिये ॥ १६ ॥
विज्ञातरूपः स तदा तपःसिद्धोऽथ धन्विना ।
ज्ञात्वा शूलं च देवेशः पाणिना समनामयत् ॥ १७ ॥
तपःसिद्ध शुक्राचार्यको उस रूपमें पहचानकर देवेश्वर शिवने उन्हें शूलपर स्थित जानकर अपने धनुषयुक्त हाथसे उस शूलको झुका दिया ॥ १७ ॥
आनतेनाथ शूलेन पाणिनामिततेजसा ।
पिनाकमिति चोवाच शूलमुग्रायुधः प्रभुः ॥ १८ ॥
जब अमित तेजस्वी शूल उनके हाथसे मुड़कर धनुषके रूपमें परिणत हो गया, तब उग्र धनुर्धर भगवान् शिवने पाणिसे आनत होनेके कारण उस शूलको 'पिनाक' कहा ॥ १८ ॥
पाणिमध्यगतं दृष्ट्वा भार्गवं तमुमापतिः ।
आस्यं विवृत्य ककुदी पाणिना प्राक्षिपच्छनैः ॥ १९ ॥
उसके मुड़नेके साथ ही भृगुपुत्र उशना उनके हाथमें आ गये, उशनाको हाथमें आया देख देवेश्वर उमावल्लभ भगवान् शिवने मुँह फैला लिया और धीरेसे हाथका धक्का देकर उशनाको मुखके भीतर डाल दिया ॥ १९ ॥
स तु प्रविष्ट उशना कोष्ठं माहेश्वरं प्रभुः ।
व्यचरच्चापि तत्रासौ महात्मा भृगुनन्दनः ॥ २० ॥
महादेवजीके पेटमें घुसकर प्रभावशाली महामना भृगुनन्दन उशना उसके भीतर सब ओर विचरने लगे ॥

युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं व्यचरद् राजन्नुशना तस्य धीमतः ।
जठरे देवदेवस्य किं चाकार्षीन्महाद्युतिः ॥ २१ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**राजन्! महातेजस्वी उशनाने बुद्धिमान् देवाधिदेव महादेवजीके उदरमें किसलिये विचरण किया और वहाँ क्या किया? ॥ २१ ॥

भीष्म उवाच

पुरा सोऽन्तर्जलगतः स्थाणुभूतो महाव्रतः।
वर्षाणामभवद् राजन् प्रयुतान्यर्बुदानि च॥ २२॥
**भीष्मजीने कहा—**नरेश्वर! प्राचीनकालमें महान् व्रतधारी महादेवजी जलके भीतर ठूँठे काठकी भाँति स्थिर भावसे खड़े हो लाखों-अरबों वर्षोंतक तपस्या करते रहे॥ २२॥
उदतिष्ठत् तपस्तप्त्वा दुश्वरं च महाह्रदात्।
ततो देवातिदेवस्तं ब्रह्मा वै समसर्पत॥ २३॥
वह दुष्कर तपस्या पूरी करके जब वे जलके उस महान् सरोवरसे बाहर निकले, तब देवदेव ब्रह्माजी उनके पास गये॥ २३॥
तपोवृद्धिमपृच्छच्च कुशलं चैवमव्ययः।
तपः सुचीर्णमिति च प्रोवाच वृषभध्वजः॥ २४॥
अविनाशी ब्रह्माजीने उनकी तपोवृद्धिका कुशल-समाचार पूछा। तब भगवान् वृषभध्वजने यह बताया कि 'मेरी तपस्या भलीभाँति सम्पन्न हो गयी'॥ २४॥
तत्संयोगेन बुद्धिं चाप्यपश्यत् स तु शंकरः।
महामतिरचिन्त्यात्मा सत्यधर्मरतः सदा॥ २५॥
तत्पश्चात् परम् बुद्धिमान्, अचिन्त्यस्वरूप और सदा सत्यधर्मपरायण महादेवजीने अपनी तपस्याके सम्पर्कसे उशनाकी तपस्यामें भी वृद्धि हुई देखी॥ २५॥
स तेनाढ्यो महायोगी तपसा च धनेन च।
व्यराजत महाराज त्रिषु लोकेषु वीर्यवान्॥ २६॥
महाराज! महायोगी उशना उस तपस्यारूप धनसे सम्पन्न एवं शक्तिशाली हो तीनों लोकोंमें प्रकाशित होने लगे॥ २६॥
ततः पिनाकी योगात्मा ध्यानयोगं समाविशत्।
उशना तु समुद्विग्नो निलिल्ये जठरे ततः॥ २७॥
तदनन्तर पिनाकधारी योगी महादेवने ध्यान लगाया। उस समय उशना अत्यन्त उद्विग्न हो उनके उदरमें ही विलीन होने लगे॥ २७॥
तुष्टाव च महायोगी देवं तत्रस्थ एव च।
निःसारं काङ्क्षमाणः स तेन स्म प्रतिहन्यते॥ २८॥
महायोगी उशनाने वहीं रहकर महादेवजीकी स्तुति की। वे निकलनेका मार्ग चाहते थे; परंतु महादेवजी उनकी गतिको प्रतिहत कर देते थे॥ २८॥
उशना तु तथोवाच जठरस्थो महामुनिः।
प्रसादं मे कुरुष्वेति पुनः पुनररिंदम॥ २९॥
शत्रुदमन नरेश! तब उदरमें ही रहकर महामुनि उशनाने महादेवजीसे बारंबार प्रार्थना की—'प्रभो! मुझपर कृपा कीजिये'॥ २९॥

तमुवाच महादेवो गच्छ शिश्नेन मोक्षणम् । इति सर्वाणि स्रोतांसि रुद्ध्वा त्रिदशपुङ्गवः ॥ ३० ॥ तब महादेवजीने उनसे कहा—'शिश्नके मार्गसे ही तुम्हारा उद्धार होगा, अतः उसीसे निकलो।' ऐसा कहकर देवेश्वर शिवने अन्य सारे द्वार रोक दिये ॥ ३० ॥ अपश्यमानस्तद् द्वारं सर्वतः पिहितो मुनिः । पर्यक्रामद् दह्यमान इतश्चेतश्च तेजसा ॥ ३१ ॥ सब ओरसे घिरे हुए मुनिवर उशना उस शिश्नद्वारको देख नहीं पाते थे। अतः भगवान् शंकरके तेजसे दग्ध होते हुए वे उदरमें ही इधर-उधर चक्कर काटने लगे ॥ ३१ ॥ स वै निष्क्रम्य शिश्नेन शुक्रत्वमभिपेदिवान् । कार्येण तेन नभसो नाध्यगच्छत मध्यतः ॥ ३२ ॥ तत्पश्चात् वे शिश्नके द्वारसे निकलकर सहसा बाहर आ गये। उस द्वारसे निकलनेके कारण ही उनका नाम शुक्र (वीर्य) हो गया। यही कारण है जिससे वे आकाशके बीचसे होकर नहीं निकलते ॥ ३२ ॥ विनिष्क्रान्तं तु तं दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव तेजसा । भवो रोषसमाविष्टः शूलोद्यतकरः स्थितः ॥ ३३ ॥ बाहर निकलनेपर शुक्र अपने तेजसे प्रज्वलित-से हो रहे थे। उन्हें उस अवस्थामें देखकर हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हुए भगवान् शिव पुनः रोषसे भर गये ॥ ३३ ॥ अवारयत तं देवी क्रुद्धं पशुपतिं पतिम् । पुत्रत्वमगमद् देव्या वारिते शंकरे च सः ॥ ३४ ॥ उस समय देवी पार्वतीने कुपित हुए अपने पतिदेव भगवान् पशुपतिको रोका। देवीके द्वारा भगवान् शंकरके रोक दिये जानेपर शुक्राचार्य उनके पुत्रभावको प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥

देव्युवाच

हिंसनीयस्त्वया नैव मम पुत्रत्वमागतः । न हि देवोदरात् कश्चिन्निःसृतो नाशमृच्छति ॥ ३५ ॥ **देवी पार्वतीने कहा—**प्रभो! अब यह शुक्र मेरा पुत्र हो गया; अतः आपको इसका विनाश नहीं करना चाहिये। देव! जो आपके उदरसे निकला हो, ऐसा कोई भी पुरुष विनाशको नहीं प्राप्त हो सकता ॥ ३५ ॥ ततः प्रीतो भवो देव्याः प्रहसंश्चेदमब्रवीत् । गच्छत्वेष यथाकाममिति राजन् पुनः पुनः ॥ ३६ ॥ राजन्! यह सुनकर महादेवजी पार्वतीपर बहुत प्रसन्न हुए और हँसते हुए बारंबार कहने लगे—'अब यह जहाँ चाहे जा सकता है' ॥ ३६ ॥ ततः प्रणम्य वरदं देवं देवीमुमां तथा ।

उशना प्राप तद्धीमान् गतिमिष्टां महामुनिः ॥ ३७ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् महामुनि शुक्राचार्यने वरदायक देवता महादेवजी तथा उमादेवीको प्रणाम करके अभीष्ट गति प्राप्त कर ली ॥ ३७ ॥
एतत् ते कथितं तात भार्गवस्य महात्मनः ।
चरितं भरतश्रेष्ठ यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तात युधिष्ठिर! तुमने जैसा मुझसे पूछा था, उसके अनुसार मैंने यह महात्मा भृगुपुत्र शुक्राचार्यका चरित्र तुमसे कह सुनाया ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भवभार्गवसमागमे
एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें महादेवजी और शुक्राचार्यका समागमविषयक दो सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८९ ॥


* कहते हैं, किसी समय असुरगण देवताओंको कष्ट पहुँचाकर भृगुपत्नीके आश्रममें जाकर छिप जाते थे। असुरोंने 'माता' कहकर उनकी शरण ली थी और उन्होंने पुत्र मानकर उन सबको निर्भय कर दिया था। देवता जब असुरोंको दण्ड देनेके लिये उनका पीछा करते हुए आते, तब भृगुपत्नीके प्रभावसे उनके आश्रममें प्रवेश नहीं कर पाते थे। यह देख समस्त देवताओंने भगवान् विष्णुकी शरण ली। भुवनपालक भगवान् विष्णुने देवताओं और दैवी-सम्पत्तिकी रक्षाके लिये चक्र उठाया, तथा असुरों एवं आसुर भावके उत्थानमें योग देनेवाली भृगुपत्नीका सिर काट लिया। उस समय मरनेसे बचे हुए असुर भृगुपुत्र उशनाकी शरणमें गये। उशना माताके वधसे खिन्न थे; इसलिये उन्होंने असुरोंको अभयदान दे दिया। तभीसे वे देवताओंकी उन्नतिके मार्गमें असुरोंद्वारा बाधाएँ खड़ी करते रहते हैं।

पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश

⬅ विषय-सूची (TOC)

नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

अतः परं महाबाहो यच्छ्रेयस्तद् वदस्व मे ।
न तृप्याम्यमृतस्येव वचसस्ते पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— महाबाहु पितामह! अब इसके बाद जो भी कल्याण-प्राप्तिका उपाय हो, वह मुझे बताइये। जैसे अमृत पीनेसे मन नहीं भरता, उसी तरह आपके वचन सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है ॥ १ ॥

किं कर्म पुरुषः कृत्वा शुभं पुरुषसत्तम ।
श्रेयः परमवाप्नोति प्रेत्य चेह च तद् वद ॥ २ ॥
पुरुषप्रवर! इसीलिये मैं पूछता हूँ कि पुरुष कौन-सा शुभ कर्म करे तो इसे इस लोक और परलोकमें भी परम कल्याणकी प्राप्ति हो सकती है, यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि यथापूर्वं महायशाः ।
पराशरं महात्मानं पप्रच्छ जनको नृपः ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें भी मैं तुम्हें पूर्ववत् एक प्राचीन प्रसंग सुनाऊँगा। एक समय महा-यशस्वी राजा जनकने महात्मा पराशर मुनिसे पूछा— ॥

किं श्रेयः सर्वभूतानामस्मिंल्लोके परत्र च ।
यद् भवेत् प्रतिपत्तव्यं तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ ४ ॥
‘मुने! कौन-सी ऐसी वस्तु है जो समस्त प्राणियोंके लिये इहलोक और परलोकमें भी कल्याणकारी एवं जानने योग्य है? उसे आप मुझे बताइये’ ॥ ४ ॥

ततः स तपसा युक्तः सर्वधर्मविधानवित् ।
नृपायानुग्रहमना मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ५ ॥
तब सम्पूर्ण धर्मोंके विधानको जाननेवाले वे तपस्वी मुनि राजा जनकपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे इस प्रकार बोले ॥ ५ ॥

पराशर उवाच

धर्म एव कृतः श्रेयानिह लोके परत्र च ।
तस्माद्धि परमं नास्ति यथा प्राहुर्मनीषिणः ॥ ६ ॥

पराशरजीने कहा—राजन्! जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है, धर्मका ही विधिपूर्वक अनुष्ठान किया जाय तो वह इहलोक और परलोकमें भी कल्याणकारी होता है। उससे बढ़कर दूसरा कोई श्रेयका उत्तम साधन नहीं है ॥

प्रतिपद्य नरो धर्मं स्वर्गलोके महीयते ।
धर्मात्मकः कर्मविधिर्देहिनां नृपसत्तम ॥ ७ ॥
नृपश्रेष्ठ! धर्मको जानकर उसका आश्रय लेनेवाला मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। वेदोंमें जो ‘सत्यं वद, धर्मं चर, यजेत, जुहुयात्’ इत्यादि वाक्योंद्वारा मनुष्योंका कर्तव्य विधान किया गया है, वही धर्मका लक्षण है ॥ ७ ॥

तस्मिन्नाश्रमिणः सन्तः स्वकर्माणीह कुर्वते ॥ ८ ॥
सभी आश्रमोंके लोग उस धर्ममें ही स्थित रहकर इस जगत्में अपने-अपने कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं ॥

चतुर्विधा हि लोकेऽस्मिन् यात्रा तात विधीयते ।
मर्त्या यत्रावतिष्ठन्ते सा च कामात् प्रवर्तते ॥ ९ ॥
तात! इस लोकमें चार प्रकारकी जीविकाका विधान है (ब्राह्मणके लिये यज्ञादि कराकर दक्षिणा लेना, क्षत्रियके लिये कर लेना, वैश्यके लिये खेती आदि करना और शूद्रके लिये तीनों वर्णोंकी सेवा करना)। मनुष्य इन्हीं चार प्रकारकी जीविकाओंका आश्रय लेकर रहते हैं। वह जीविका दैवेच्छासे चलती है ॥ ९ ॥

सुकृतासुकृतं कर्म निषेव्य विविधैः क्रमैः ।
दशार्धप्रविभक्तानां भूतानां बहुधा गतिः ॥ १० ॥
जो प्राणी नाना प्रकारके क्रमसे पुण्य और पापकर्मका सेवन करके पञ्चत्वको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् स्थूल शरीरका त्याग कर देते हैं, उनको मिलनेवाली गति नाना प्रकारकी बतायी गयी है ॥ १० ॥

सौवर्णं रजतं चापि यथा भाण्डं निषिच्यते ।
तथा निषिच्यते जन्तुः पूर्वकर्मवशानुगः ॥ ११ ॥
जैसे ताँबे आदिके बर्तनोंपर जब सोने और चाँदीकी कलई चढ़ा दी जाती है तब वे वैसे ही दिखायी देने लगते हैं। उसी प्रकार पूर्व कर्मोंके वशीभूत प्राणी पूर्वकृत कर्मसे लिप्त रहता है (पुण्यकर्मसे लिप्त होनेके कारण वह सुखी होता है और पापसे लिप्त होनेके कारण उसे दुःख उठाना पड़ता है) ॥ ११ ॥

नाबीजाज्जायते किंचिन्नाकृत्वा सुखमेधते ।
सुकृतैर्विन्दते सौख्यं प्राप्य देहक्षयं नरः ॥ १२ ॥
जैसे बिना बीजके कोई अंकुर पैदा नहीं होता, उसी प्रकार पुण्यकर्म किये बिना कोई सुखी या समृद्धिशाली नहीं हो सकता; अतः मनुष्य देहत्यागके पश्चात् पुण्यकर्मोंके फलसे ही सुख पाता है ॥ १२ ॥

दैवं तात न पश्यामि नास्ति दैवस्य साधनम् । स्वभावतो हि संसिद्धा देवगन्धर्वदानवाः ॥ १३ ॥ तात! इस विषयमें नास्तिक कहते हैं 'मैं प्रारब्धको प्रत्यक्ष नहीं देख पाता तथा प्रारब्धके अस्तित्वका सूचक अनुमानप्रमाण भी नहीं है। किंतु देवता, गन्धर्व और दानव आदि योनियाँ तो स्वभावसे ही प्राप्त होती हैं' ॥

प्रेत्य जातिकृतं कर्म न स्मरन्ति सदा जनाः । ते वै तस्य फलप्राप्तौ कर्म चापि चतुर्विधम् ॥ १४ ॥ इसके उत्तरमें यह कहा जा सकता है कि मरकर गये हुए प्राणी पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंको सदैव याद नहीं रख सकते। किंतु जब किसी पूर्वकृत कर्मका फल प्राप्त होता है तब वे ही लोग सदा (मन, वाणी, नेत्र और क्रियाद्वारा किये हुए) चार प्रकारके कर्मोंका स्मरण करते हैं—अर्थात् यह कहते हैं कि मैंने पूर्व जन्ममें कोई ऐसा कर्म किया होगा जिसका फल इस रूपमें प्राप्त हुआ है ॥

लोकयात्रायश्चैव शब्दो वेदाश्रयः कृतः । शान्त्यर्थं मनसस्तात नैतद् वृद्धानुशासनम् ॥ १५ ॥ तात! नास्तिक लोग जो यह कहते हैं कि लोकयात्राके निर्वाह और मनकी शान्तिके लिये वेदोक्त शब्दोंको प्रमाण माना गया है; अर्थात् वेदोंमें जो कर्म करनेका विधान है, वह तो असमर्थ पुरुषोंके जीविकानिर्वाहके लिये है और जो पूर्वजन्मके किये हुए कर्मकी चर्चा आयी है वह दुखी मनुष्योंके मनको धीरज बँधानेके लिये है, परंतु यह मत ठीक नहीं है; क्योंकि पतञ्जलि आदि ज्ञानवृद्ध पुरुषोंने ऐसा उपदेश नहीं किया है (पतञ्जलिने ‘तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः' इस सूत्रके द्वारा जाति (जन्म), आयु और सुख-दुःखरूप भोगको पूर्वकृत कर्मका फल बताया है) ॥ १५ ॥

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् । कुरुते यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥ मनुष्य नेत्र, मन, वाणी और क्रियाके द्वारा चार प्रकारके कर्म करता है और जैसा कर्म करता है वैसा ही उसका फल पाता है ॥ १६ ॥

निरन्तरं च मिश्रं च लभते कर्म पार्थिव । कल्याणं यदि वा पापं न तु नाशोऽस्य विद्यते ॥ १७ ॥ राजन्! मनुष्य कर्मके फलरूपसे कभी केवल सुख, कभी सुख-दुःख दोनोंको एक साथ प्राप्त करता है। पुण्य या पाप कोई भी कर्म क्यों न हो, फल भोगे बिना उसका नाश नहीं होता ॥ १७ ॥

कदाचित् सुकृतं तात कूटस्थमिव तिष्ठति । मज्जमानस्य संसारे यावद् दुःखाद् विमुच्यते ॥ १८ ॥ ततो दुःखक्षयं कृत्वा सुकृतं कर्म सेवते ।

सुकृतक्षयाच्च दुष्कृतं तद् विद्धि मनुजाधिप ॥ १९ ॥
तात! संसार-सागरमें डूबते हुए मनुष्यका पुण्यकर्म कभी-कभी तबतक स्थिर-जैसा रहता है जबतक कि दुःखसे उसका छुटकारा नहीं हो जाता। तदनन्तर दुःखका भोग समाप्त कर लेनेपर जीव अपने पुण्य कर्मके फलका उपभोग आरम्भ करता है। जब पुण्यका भी क्षय हो जाता है तब फिर वह पापका फल भोगता है। नरेश्वर! इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥

दमः क्षमा धृतिस्तेजः संतोषः सत्यवादिता ।
ह्रीरहिंसाऽव्यसनिता दाक्ष्यं चेति सुखावहाः ॥ २० ॥
इन्द्रियसंयम, क्षमा, धैर्य, तेज, संतोष, सत्यभाषण, लज्जा, अहिंसा, दुर्व्यसनका अभाव तथा दक्षता—ये सब सुख देनेवाले हैं ॥ २० ॥

दुष्कृते सुकृते चापि न जन्तुर्नियतो भवेत् ।
नित्यं मनःसमाधाने प्रयतेत विचक्षणः ॥ २१ ॥
विद्वान् पुरुषको जीवनपर्यन्त पाप या पुण्यमें भी आसक्त न होकर अपने मनको परमात्माके ध्यानमें लगानेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ २१ ॥

नायं परस्य सुकृतं दुष्कृतं चापि सेवते ।
करोति यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते ॥ २२ ॥
जीव दूसरेके किये हुए शुभ अथवा अशुभ कर्मको नहीं भोगता, वह स्वयं जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है ॥ २२ ॥

सुखदुःखे समाधाय पुमानन्येन गच्छति ।
अन्येनैव जनः सर्वः संगतो यश्च पार्थिवः ॥ २३ ॥
विवेकी पुरुष सुख और दुःखको अपने भीतर विलीन करके अन्य मार्गसे अर्थात् मोक्षप्राप्तिके मार्गद्वारा चलता है। जो स्त्री, पुत्र और धन आदिमें आसक्त हैं, वे सब संसारी जीव उससे भिन्न दूसरे ही मार्गपर चलते हैं; अतः जन्मते और मरते रहते हैं ॥ २३ ॥

परेषां यदसूयेत न तत् कुर्यात् स्वयं नरः ।
यो ह्यसूयुस्तथायुक्तः सोऽवहासं नियच्छति ॥ २४ ॥
मनुष्य दूसरेके जिस कर्मकी निन्दा करे, उसको स्वयं भी न करे। जो दूसरेकी निन्दा करता है; किंतु स्वयं उसी निन्द्य कर्ममें लगा रहता है, वह उपहासका पात्र होता है ॥

भीरू राजन्यो ब्राह्मणः सर्वभक्ष्यो
वैश्योऽनीहावान् हीनवर्णोऽलसश्च ।
विद्वांश्चाशीलो वृत्तहीनः कुलीनः
सत्याद् विभ्रष्टो धार्मिकः स्त्री च दुष्टा ॥ २५ ॥
रागी युक्तः पचमानोऽत्महेतो-
र्मूर्खो वक्ता नृपहीनं च राष्ट्रम् ।

एते सर्वे शोच्यतां यान्ति राजन् यश्चायुक्तः स्नेहहीनः प्रजासु ॥ २६ ॥

राजन्! डरपोक क्षत्रिय, (भक्ष्याभक्ष्यका विचार न करके) सब कुछ खानेवाला ब्राह्मण, धनोपार्जनकी चेष्टासे रहित या अकर्मण्य वैश्य, आलसी शूद्र, उत्तम गुणोंसे रहित विद्वान्, सदाचारका पालन न करनेवाला कुलीन पुरुष, सत्यसे भ्रष्ट हुआ धार्मिक पुरुष, दुराचारिणी स्त्री, विषयासक्त योगी, केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला मनुष्य, मूर्ख वक्ता, राजासे रहित राष्ट्र तथा अजितेन्द्रिय होकर प्रजाके प्रति स्नेह न रखनेवाला राजा—ये सब-के-सब शोकके योग्य हैं, अर्थात् निन्दनीय हैं ॥ २५-२६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९० ॥

पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ

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एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ

पराशर उवाच

मनोरथरथं प्राप्य इन्द्रियाख्यहयं नरः ।
रश्मिभिर्ज्ञानसम्भूतैर्यो गच्छति स बुद्धिमान् ॥ १ ॥
**पराशरजी कहते हैं—**राजन्! इन्द्रियरूप घोड़ोंसे युक्त मनोमय (सूक्ष्म शरीर) एक रथ है। ज्ञानाकार वृत्तियाँ ही इस रथके घोड़ोंकी बागडोर हैं। इन उपकरणोंसे युक्त रथपर आरूढ़ होकर जो पुरुष यात्रा करता है, वह बुद्धिमान् है ॥ १ ॥

सेवाऽऽश्रितेन मनसा वृत्तिहीनस्य शस्यते ।
द्विजातिहस्तान्निर्वृत्ता न तु तुल्यात् परस्परात् ॥ २ ॥
जो मनुष्य इन्द्रियोंकी बाह्य वृत्तिसे रहित (अन्तर्मुख) होकर ईश्वरकी शरणमें गये हुए मनके द्वारा उनकी उपासना करता है, उसकी वह उपासना श्रेष्ठ समझी जाती है। ऐसी उपासना किसी विद्वान् एवं भक्त ब्राह्मणके वरद हस्तसे ही उपलब्ध होती है। समान योग्यतावाले आपसके लोगोंसे उसकी प्राप्ति नहीं होती ॥ २ ॥

आयुर्न सुलभं लब्ध्वा नावकर्षेद् विशाम्पते ।
उत्कर्षार्थं प्रयतेत नरः पुण्येन कर्मणा ॥ ३ ॥
प्रजानाथ! मनुष्य-शरीरकी आयु सुलभ नहीं है—वह दुर्लभ वस्तु है, उसे पाकर आत्माको नीचे नहीं गिराना चाहिये। मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्यकर्मके अनुष्ठानद्वारा आत्माके उत्थानके लिये सदा प्रयत्न करता रहे ॥ ३ ॥

वर्णेभ्यो हि परिभ्रष्टो न वै सम्मानमर्हति ।
न तु यः सत्क्रियां प्राप्य राजसं कर्म सेवते ॥ ४ ॥
जो मनुष्य दुष्कर्म करके वर्णसे भ्रष्ट हो जाता है, वह कदापि सम्मान पानेके योग्य नहीं है। इसके सिवा जो मनुष्य सत्त्वगुणके द्वारा सत्कार पाकर फिर राजस कर्मका सेवन करने लगता है, वह भी सम्मानके योग्य नहीं है ॥

वर्णोत्कर्षमवाप्नोति नरः पुण्येन कर्मणा ।
दुर्लभं तमलब्ध्वा हि हन्यात् पापेन कर्मणा ॥ ५ ॥
पुण्य कर्मसे ही मनुष्य उत्तम वर्णमें जन्म पाता है। पापीके लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है। वह उसे न पाकर अपने पाप कर्मके द्वारा अपना ही नाश करता है ॥ ५ ॥

अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत् ।

पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वयं कृतम् । तस्मात् पापं न सेवेत कर्म दुःखफलोदयम् ॥ ६ ॥ अनजानमें जो पाप बन जाय उसे तपस्याके द्वारा नष्ट कर दे; क्योंकि अपना किया हुआ पापकर्म पापरूप दुःखके रूपमें ही फलता है। अतः दुःखमय फल देनेवाले पापकर्मका कदापि सेवन न करे ॥ ६ ॥

पापानुबन्धं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् । तन्न सेवेत मेधावी शुचिः कुशलिनं यथा ॥ ७ ॥ पापसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कर्म है उसका कितना ही बड़ा लौकिक सुखरूप फल क्यों न हो; बुद्धिमान् पुरुष उसका कदापि सेवन न करे। वह उससे उसी तरह दूर रहे जैसे पवित्र मनुष्य चाण्डालसे ॥ ७ ॥

किं कष्टमनुपश्यामि फलं पापस्य कर्मणः । प्रत्यापन्नस्य हि ततो नात्मा तावद् विरोचते ॥ ८ ॥ क्या पापकर्मका कोई दुःखदायक फल मैं देखता हूँ? अर्थात् नहीं देखता। ऐसा मानकर पापमें प्रवृत्त हुए मनुष्यको परमात्माका चिन्तन अच्छा नहीं लगता ॥ ८ ॥

प्रत्यापत्तिश्च यस्येह बालिशस्य न जायते । तस्यापि सुमहांस्तापः प्रस्थितस्योपजायते ॥ ९ ॥ इस संसारमें जिस मूर्खको तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती उस मनुष्यको परलोकमें जानेपर महान् संताप भोगना पड़ता है ॥ ९ ॥

विरक्तं शोध्यते वस्त्रं न तु कृष्णोपसंहितम् । प्रयत्नेन मनुष्येन्द्र पापमेवं निबोध मे ॥ १० ॥ नरेन्द्र! बिना रँगा हुआ वस्त्र धोनेसे स्वच्छ हो जाता है; किंतु जो काले रंगमें रँगा हो वह प्रयत्न करनेसे भी सफेद नहीं होता, पापको भी ऐसा ही समझो। उसका रंग भी जल्दी नहीं उतरता है ॥ १० ॥

स्वयं कृत्वा तु यः पापं शुभमेवानुतिष्ठति । प्रायश्चित्तं नरः कर्तुमुभयं सोऽश्नुते पृथक् ॥ ११ ॥ जो स्वयं जान-बूझकर पाप करनेके पश्चात् उसके प्रायश्चित्तके उद्देश्यसे शुभ कर्मका अनुष्ठान करता है, वह शुभ और अशुभ दोनोंका पृथक्-पृथक् फल भोगता है ॥ ११ ॥

अज्ञानात् तु कृतां हिंसामहिंसा व्यपकर्षति । ब्राह्मणाः शास्त्रनिर्देशादित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ॥ १२ ॥ तथा कामकृतं नास्य विहिंसैवानुकर्षति । इत्याहुर्ब्रह्मशास्त्रज्ञा ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः ॥ १३ ॥ अनजानमें जो हिंसा हो जाती है उसे अहिंसा-व्रतका पालन दूर कर देता है। ब्रह्मवादी ब्राह्मण शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार ऐसा ही कहते हैं; किंतु स्वेच्छासे किये हुए हिंसामय

पापकर्मको अहिंसाका व्रत भी दूर नहीं कर सकता। ऐसा वेदशास्त्रोंके ज्ञाता, वेदका उपदेश देनेवाले ब्राह्मणोंका कथन है ॥ १२-१३ ॥

अहं तु तावत् पश्यामि कर्म यद् वर्तते कृतम् । गुणयुक्तं प्रकाशं वा पापेनानुपसंहितम् ॥ १४ ॥

परंतु मैं तो ऐसा देखता हूँ कि जो कर्म किया गया है वह पुण्य हो या पापयुक्त, प्रकटरूपमें किया गया हो या छिपाकर (तथा जान-बूझकर किया गया हो या अनजानमें), वह अपना फल अवश्य देता ही है ॥ १४ ॥

यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम् । बुद्धियुक्तानि तानीह कृतानि मनसा सह ॥ १५ ॥ भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्बणम् । अबुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा ॥ १६ ॥

धर्मज्ञ राजा जनक! जैसे मनसे सोच-विचारकर बुद्धिद्वारा निश्चय करके जो स्थूल या सूक्ष्म कर्म यहाँ किये जाते हैं वे यथायोग्य फल अवश्य देते हैं। उसी प्रकार हिंसा आदि उग्र कर्मके द्वारा अनजानमें किया हुआ भयंकर पाप यदि सदा बनता रहे तो उसका फल भी मिलता ही है; अन्तर इतना ही है कि जान-बूझकर किये हुए कर्मकी अपेक्षा उसका फल बहुत कम हो जाता है ॥ १५-१६ ॥

कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभिस्तथा । न चरेत् तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत् ॥ १७ ॥

देवताओं और मुनियोंद्वारा जो अनुचित कर्म किये गये हों धर्मात्मा पुरुष उनका अनुकरण न करे; और उन कर्मोंको सुनकर भी उन देवता आदिकी निन्दा भी न करे ॥ १७ ॥

संचिन्त्य मनसा राजन् विदित्वा शक्यमात्मनः । करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ॥ १८ ॥

राजन्! जो मनुष्य मनसे खूब सोच-विचारकर, 'अमुक काम मुझसे हो सकेगा या नहीं'—इसका निश्चय करके शुभकर्मका अनुष्ठान करता है, वह अवश्य ही अपनी भलाई देखता है ॥ १८ ॥

नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीयते यथा । नवेतरे तथाभावं प्राप्नोति सुखभावितम् ॥ १९ ॥

जैसे नये बने हुए कच्चे घड़ेमें रखा हुआ जल नष्ट हो जाता है, परंतु पके-पकाये घड़ेमें रखा हुआ ज्यों-का-त्यों बना रहता है, उसी प्रकार परिपक्व विशुद्ध अन्तःकरणमें सम्पादित सुखदायक शुभकर्म निश्चल रहते हैं ॥ १९ ॥

सतोयेऽन्यत् तु यत् तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते । वृद्धे वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ॥ २० ॥

एवं कर्माणि यानीह बुद्धियुक्तानि पार्थिव । समानि चैव यानीह तानि पुण्यतमान्यपि ॥ २१ ॥ राजन्! उसी जलयुक्त पक्के घड़ेमें यदि दूसरा जल डाला जाय तो पात्रमें रखा हुआ पहलेका जल और नया डाला हुआ जल—दोनों मिलकर बढ़ जाते हैं और इस प्रकार वह घड़ा अधिक जलसे सम्पन्न हो जाता है। उसी तरह यहाँ विवेकपूर्वक किये हुए जो पुण्य कर्म संचित हैं, उन्हींके समान जो नये पुण्य कर्म किये जाते हैं—वे दोनों मिलकर अधिक पुण्यतम कर्म हो जाते हैं (और उनके द्वारा वह पुरुष महान् पुण्यात्मा हो जाता है) ॥ २०-२१ ॥

राज्ञा जेतव्याः शत्रवश्चोन्नताश्च सम्यक् कर्तव्यं पालनं च प्रजानाम् । अग्निश्चेयो बहुभिश्चापि यज्ञै- रन्त्ये मध्ये वा वनमाश्रित्य स्थेयम् ॥ २२ ॥ नरेश्वर! राजाको चाहिये कि वह बढ़े हुए शत्रुओंको जीते। प्रजाका न्यायपूर्वक पालन करे। नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा अग्निदेवको तृप्त करे तथा वैराग्य होनेपर मध्यम अवस्थामें अथवा अन्तिम अवस्थामें वनमें जाकर रहे ॥ २२ ॥

दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् । गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ॥ २३ ॥ राजन्! प्रत्येक पुरुषको इन्द्रियसंयमी और धर्मात्मा होकर समस्त प्राणियोंको अपने ही समान समझना चाहिये। जो विद्या, तप और अवस्थामें अपनेसे बड़े हों अथवा गुरु-कोटिके लोग हों, उन सबकी यथाशक्ति पूजा करनी चाहिये। सत्यभाषण और अच्छे आचार-विचारसे ही सुख मिलता है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९१ ॥

पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे

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द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीता—धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि-सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ

पराशर उवाच

कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रयच्छति ।
प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना ॥ १ ॥
पराशरजी कहते हैं— राजन्! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? यह प्राणी सारा कार्य स्वयं अपने ही लिये करता है ॥ १ ॥

गौरवेण परित्यक्तं निःस्नेहं परिवर्जयेत् ।
सोदर्यं भ्रातरमपि किमुतान्यं पृथग्जनम् ॥ २ ॥
अपना सगा भाई भी यदि अपने श्रेष्ठ स्वभावका और स्नेहका त्याग कर दे तो लोग उसको त्याग देते हैं; फिर दूसरे किसी साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है ॥ २ ॥

विशिष्टस्य विशिष्टाच्च तुल्यौ दानप्रतिग्रहौ ।
तयोः पुण्यतरं दानं तद् द्विजस्य प्रयच्छतः ॥ ३ ॥
श्रेष्ठ पुरुषको दिया हुआ दान और श्रेष्ठ पुरुषसे प्राप्त हुआ प्रतिग्रह—इन दोनोंका महत्त्व बराबर है तो भी इन दोनोंमेंसे ब्राह्मणके लिये प्रतिग्रह स्वीकार करनेकी अपेक्षा दान देना अधिक पुण्यमय माना गया है ॥ ३ ॥

न्यायागतं धनं चैव न्यायेनैव विवर्धितम् ।
संरक्ष्यं यत्नमास्थाय धर्मार्थमिति निश्चयः ॥ ४ ॥
जो धन न्यायसे प्राप्त किया गया हो और न्यायसे ही बढ़ाया गया हो, उसको यत्नपूर्वक धर्मके उद्देश्यसे बचाये रखना चाहिये। यही धर्मशास्त्रका निश्चय है ॥ ४ ॥

न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमर्जयेत् ।
शक्तितः सर्वकार्याणि कुर्यान्नर्द्धिमनुस्मरेत् ॥ ५ ॥
धर्म चाहनेवाले पुरुषको क्रूरकर्मके द्वारा धनका उपार्जन नहीं करना चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार समस्त शुभ कर्म करे। धन बढ़ानेकी चिन्तामें न पड़े ॥ ५ ॥

अपो हि प्रयतः शीतास्तापिता ज्वलनेन वा ।
शक्तितोऽतिथये दत्त्वा क्षुधार्तायाश्नुते फलम् ॥ ६ ॥