महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन
त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन
भीष्म उवाच
आसीत् किल नरश्रेष्ठ महापद्मे पुरोत्तमे ।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे कश्चिद् विप्रः समाहितः ॥ १ ॥
सौम्यः सोमान्वये वेदे गताध्वा छिन्नसंशयः ।
धर्मनित्यो जितक्रोधो नित्यतृप्तो जितेन्द्रियः ॥ २ ॥
तपःस्वाध्यायनिरतः सत्यः सज्जनसम्मतः ।
न्यायप्राप्तेन वित्तेन स्वेन शीलेन चान्वितः ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं—नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! (नारदजीने जो कथा सुनायी, वह इस प्रकार है—) गंगाके दक्षिणतटपर महापद्म नामक कोई श्रेष्ठ नगर है। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह एकाग्रचित्त और सौम्य स्वभावका मनुष्य था। उसका जन्म चन्द्रमाके कुलमें—अत्रिगोत्रमें हुआ था। वेदमें उसकी अच्छी गति थी और उसके मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं था। वह सदा धर्मपरायण, क्रोधरहित, नित्य संतुष्ट, जितेन्द्रिय, तप और स्वाध्यायमें संलग्न, सत्यवादी और सत्पुरुषोंके सम्मानका पात्र था। न्यायोपार्जित धन और अपने ब्राह्मणोचित शीलसे सम्पन्न था ।। १—३ ।।
ज्ञातिसम्बन्धिविपुले सत्त्वाद्याश्रयसम्मिति ।
कुले महति विख्याते विशिष्टां वृत्तिमास्थितः ॥ ४ ॥
उसके कुलमें सगे-सम्बन्धियोंकी संख्या अधिक थी। सभी लोग सत्त्वप्रधान सद्गुणोंका सहारा लेकर श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करते थे। उस महान् एवं विख्यात कुलमें रहकर वह उत्तम आजीविकाके सहारे जीवन-निर्वाह करता था ।। ४ ।।
स पुत्रान् बहुलान् दृष्ट्वा विपुले कर्मणि स्थितः ।
कुलधर्माश्रितो राजन् धर्मचर्यास्थितोऽभवत् ॥ ५ ॥
राजन्! उसने देखा कि मेरे बहुत-से पुत्र हो गये, तब वह लौकिक कार्यसे विरक्त हो महान् कर्ममें संलग्न हो गया और अपने कुलधर्मका आश्रय ले धर्माचरणमें ही तत्पर रहने लगा ।। ५ ।।
ततः स धर्मं वेदोक्तं तथा शास्त्रोक्तमेव च ।
शिष्टाचीर्णं च धर्मं च त्रिविधं चिन्त्य चेतसा ॥ ६ ॥
तदनन्तर उसने वेदोक्त धर्म, शास्त्रोक्त धर्म तथा शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरित धर्म—इन तीन प्रकारके धर्मोंपर मन-ही-मन विचार करना आरम्भ किया— ॥
किन्नु मे स्याच्छुभं कृत्वा किं कृतं किं परायणम् । इत्येवं खिद्यते नित्यं न च याति विनिश्चयम् ।। ७ ।।
‘क्या करनेसे मेरा कल्याण होगा? मेरा क्या कर्तव्य है तथा कौन मेरे लिये परम आश्रय है?’ इस प्रकार वह सदा सोचते-सोचते खिन्न हो जाता था; परंतु किसी निर्णयपर नहीं पहुँच पाता था ।। ७ ।।
तस्यैवं खिद्यमानस्य धर्मं परममास्थितः । कदाचिदतिथिः प्राप्तो ब्राह्मणः सुसमाहितः ।। ८ ।।
एक दिन जब वह इसी तरह सोच-विचारमें पड़ा हुआ कष्ट पा रहा था, उसके यहाँ एक परम धर्मात्मा तथा एकाग्रचित्त ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आ पहुँचा ।। ८ ।।
स तस्मै सत्क्रियां चक्रे क्रियायुक्तेन हेतुना । विश्रान्तं सुसमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ।। ९ ।।
ब्राह्मणने उस अतिथिका क्रियायुक्त हेतु (शास्त्रोक्त विधि) से आदर-सत्कार किया और जब वह सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करने लगा, तब उससे इस प्रकार कहा ।। ९ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३५३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३५३ ।।
३५४-
चतुःपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन
ब्राह्मण उवाच
समुत्पन्नाभिधानोऽस्मि वाङ्माधुर्येण तेऽनघ ।
मित्रत्वमभिपन्नस्त्वं किंचिद् वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ १ ॥
ब्राह्मण बोला— निष्पाप! आपकी मीठी बातें सुनकर ही मैं आपके प्रति स्नेह-बन्धनसे बँध गया हूँ। आपके ऊपर मेरा मित्रभाव हो गया है; अतः आपसे कुछ कह रहा हूँ, मेरी बात सुनिये ॥ १ ॥
गृहस्थधर्मं विप्रेन्द्र कृत्वा पुत्रगतं त्वहम् ।
धर्मं परमकं कुर्यां को हि मार्गो भवेद् द्विज ॥ २ ॥
विप्रवर! मैं गृहस्थ-धर्मको अपने पुत्रोंके अधीन करके सर्वश्रेष्ठ धर्मका पालन करना चाहता हूँ। ब्रह्मन्! बताइये, मेरे लिये कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर होगा? ॥ २ ॥
अहमात्मानमास्थाय एक एवात्मनि स्थितिम् ।
कर्तुं काङ्क्षामि नेच्छामि बद्धः साधारणैर्गुणैः ॥ ३ ॥
कभी मेरी इच्छा होती है कि अकेला ही रहूँ और आत्माका आश्रय लेकर उसीमें स्थित हो जाऊँ? परंतु इन तुच्छ विषयोंसे बँधा होनेके कारण वह इच्छा नष्ट हो जाती है ॥ ३ ॥
यावदेतदतीतं मे वयः पुत्रफलाश्रितम् ।
तावदिच्छामि पाथेयमादातुं पारलौकिकम् ॥ ४ ॥
अब तककी सारी आयु पुत्रसे फल पानेकी कामनामें ही बीत गयी। अब ऐसे धर्ममय धनका संग्रह करना चाहता हूँ, जो परलोकके मार्गमें पाथेय (राहखर्च) का काम दे सके ॥ ४ ॥
अस्मिन् हि लोकसम्भारं परं पारमभीप्सतः ।
उत्पन्ना मे मतिरियं कुतो धर्ममयः प्लवः ॥ ५ ॥
मुझे इस संसारसागरसे पार जानेकी इच्छा हुई है, अतः मेरे मनमें यह जिज्ञासा हो रही है कि मुझे धर्ममयी नौका कहाँसे प्राप्त होगी? ॥ ५ ॥
संयुज्यमानानि निशम्य लोके
निर्यात्यमानानि च सात्त्विकानि ।
दृष्ट्वा तु धर्मध्वजकेतुमालां
प्रकीर्यमाणामुपरि प्रजानाम् ॥ ६ ॥
न मे मनो रज्यति भोगकाले
दृष्ट्वा यतीन् प्रार्थयतः परत्र ।
तेनातिथि बुद्धिबलाश्रयेण
धर्मेण धर्मे विनियुङ्क्ष्व मां त्वम् ॥ ७ ॥
जब मैं सुनता हूँ कि संसारमें विषयोंके सम्पर्कमें आये हुए सात्त्विक पुरुष भी तरह-तरहकी यातनाएँ भोगते हैं तथा जब देखता हूँ कि समस्त प्रजाके ऊपर यमराजकी ध्वजाएँ फहरा रही हैं, तब भोगकालमें भोगोंके प्राप्त होनेपर भी उन्हें भोगनेकी रुचि मेरे मनमें नहीं होती है। जब संन्यासियोंको भी दूसरोंके दरवाजोंपर अन्न-वस्त्रकी भीख माँगते देखता हूँ, तब उस संन्यास-धर्ममें भी मेरा मन नहीं लगता है; अतः अतिथिदेव! आप अपनी ही बुद्धिके बलसे अब मुझे धर्मद्वारा धर्ममें लगाइये ॥ ६-७ ॥
सोऽतिथिर्वचनं तस्य श्रुत्वा धर्माभिभाषिणः।
प्रोवाच वचनं श्लक्ष्णं प्राज्ञो मधुरया गिरा ॥ ८ ॥
धर्मयुक्त वचन बोलनेवाले उस ब्राह्मणकी बात सुनकर उस विद्वान् अतिथिने मधुर वाणीमें यह उत्तम वचन कहा ॥ ८ ॥
अतिथिरुवाच
</div>अहमप्यत्र मुह्यामि ममाप्येष मनोरथः।
न च संनिश्चयं यामि बहुद्वारे त्रिविष्टपे ॥ ९ ॥
**अतिथिने कहा—**विप्रवर! मेरा भी ऐसा ही मनोरथ है। मैं भी आपकी ही भाँति श्रेष्ठ धर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ, परंतु मुझे भी इस विषयमें मोह ही बना हुआ है। स्वर्गके अनेक द्वार (साधन) हैं, अतः किसका आश्रय लिया जाय? इसका निश्चय मैं भी नहीं कर पाता हूँ ॥ ९ ॥
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद् यज्ञफलं द्विजाः।
वानप्रस्थाश्रयाः केचिद् गार्हस्थ्यं केचिदास्थिताः ॥ १० ॥
कोई द्विज मोक्षकी प्रशंसा करते हैं तो कोई यज्ञफलकी। कोई वानप्रस्थ-धर्मका आश्रय लेते हैं तो कोई गार्हस्थ्य-धर्मका ॥ १० ॥
राजधर्माश्रयं केचित् केचिदात्मफलाश्रयम्।
गुरुधर्माश्रयं केचित्केचिद् वाक्संयमाश्रयम् ॥ ११ ॥
कोई राजधर्म, कोई आत्मज्ञान, कोई गुरुशुश्रूषा और कोई मौनव्रतका ही आश्रय लिये बैठे हैं ॥ ११ ॥
मातरं पितरं केचिच्छुश्रूषन्तो दिवं गताः।
अहिंसया परे स्वर्गं सत्येन च तथा परे ॥ १२ ॥
कुछ लोग माता-पिताकी सेवा करके ही स्वर्गमें चले गये। कोई अहिंसासे और कोई सत्यसे ही स्वर्गलोकके भागी हुए हैं ॥ १२ ॥
आहवेऽभिमुखाः केचिन्निहतास्त्रिदिवं गताः।
केचिदुञ्छव्रतैः सिद्धाः स्वर्गमार्गं समाश्रिताः ॥ १३ ॥ कुछ वीर पुरुष युद्धमें शत्रुओंका सामना करते हुए मारे जाकर स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं। कितने ही मनुष्य उञ्छवृत्तिके द्वारा सिद्धि प्राप्त करके स्वर्गगामी हुए हैं ॥ १३ ॥
केचिदध्ययने युक्ता वेदव्रतपराः शुभाः । बुद्धिमन्तो गताः स्वर्गं तुष्टात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ १४ ॥ कुछ बुद्धिमान् पुरुष संतुष्टचित्त और जितेन्द्रिय हो वेदोक्त व्रतका पालन तथा स्वाध्याय करते हुए शुभसम्पन्न हो स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर चुके हैं ॥ १४ ॥
आर्जवेनापरे युक्ता निहतानाजर्वैर्जनैः । ऋजवो नाकपृष्ठे वै शुद्धात्मानः प्रतिष्ठिताः ॥ १५ ॥ कितने ही सरल और शुद्धात्मा पुरुष सरलतासे ही संयुक्त हो कुटिल मनुष्योंद्वारा मारे गये और स्वर्ग-लोकमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ १५ ॥
एवं बहुविधैर्लोकैर्धर्मद्वारैरनावृतैः । ममापि मतिराविग्ना मेघलेखेव वायुना ॥ १६ ॥ इस प्रकार लोकमें धर्मके विविध एवं बहुत-से दरवाजे खुले हुए हैं, उनसे मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार उद्विग्न एवं चंचल हो उठी है, जैसे वायुसे मेघोंकी घटा ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने चतुःपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५४ ॥
अतिथिद्वारा नागराज पद्मनाभके सदाचार और सद्गुणोंका वर्णन तथा ब्राह्मणको उसके पास जानेके लिये प्रेरणा
पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
अतिथिद्वारा नागराज पद्मनाभके सदाचार और सद्गुणोंका वर्णन तथा ब्राह्मणको उसके पास जानेके लिये प्रेरणा
अतिथिरुवाच
उपदेशं तु ते विप्र करिष्येऽहं यथाक्रमम् ।
गुरुणा मे यथाख्यातमर्थतत्त्वं तु मे शृणु ॥ १ ॥
**अतिथिने कहा—**विप्रवर! मेरे गुरुने इस विषयमें जो तात्त्विक बात बतलायी है, उसीका मैं तुमको क्रमशः उपदेश करूँगा। तुम मेरे इस कथनको सुनो ॥ १ ॥
यत्र पूर्वाभिसर्गे वै धर्मचक्रं प्रवर्तितम् ।
नैमिषे गोमतीतीरे तत्र नागाह्वयं पुरम् ॥ २ ॥
समग्रैस्त्रिदशैस्तत्र इष्टमासीद् द्विजर्षभ ।
यत्रेन्द्रातिक्रमं चक्रे मान्धाता राजसत्तमः ॥ ३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! पूर्वकल्पमें जहाँ प्रजापतिने धर्मचक्र प्रवर्तित किया था, सम्पूर्ण देवताओंने जहाँ यज्ञ किया था तथा जहाँ राजाओंमें श्रेष्ठ मान्धाता यज्ञ करनेमें इन्द्रसे भी आगे बढ़ गये थे, उस नैमिषारण्यमें गोमतीके तटपर नागपुर नामक एक नगर है ॥ २-३ ॥
कृताधिवासो धर्मात्मा तत्र चक्षुःश्रवा महान् ।
पद्मनाभो महानागः पद्म इत्येव विश्रुतः ॥ ४ ॥
वहाँ एक महान् धर्मात्मा सर्प निवास करता है। उस महानागका नाम तो है पद्मनाभ; परंतु पद्म नामसे ही उसकी प्रसिद्धि है ॥ ४ ॥
स वाचा कर्मणा चैव मनसा च द्विजर्षभ ।
प्रसादयति भूतानि त्रिविधे वर्त्मनि स्थितः ॥ ५ ॥
द्विजश्रेष्ठ! पद्म मन, वाणी और क्रियाद्वारा कर्म, उपासना और ज्ञान—इन तीनों मार्गोंका आश्रय लेकर रहता और सम्पूर्ण भूतोंको प्रसन्न रखता है ॥ ५ ॥
साम्ना भेदेन दानेन दण्डेनेति चतुर्विधम् ।
विषमस्थं समस्थं च चक्षुर्ध्यानेन रक्षति ॥ ६ ॥
वह विषमतापूर्ण बर्ताव करनेवाले पुरुषको साम, दान, दण्ड और भेद-नीतिके द्वारा राहपर लाता है, समदर्शीकी रक्षा करता है और नेत्र आदि इन्द्रियोंको विचारके द्वारा कुमार्गमें जानेसे बचाता है ॥ ६ ॥
तमतिक्रम्य विधिना प्रष्टुमर्हसि काङ्क्षितम् ।
स ते परमकं धर्मं न मिथ्या दर्शयिष्यति ॥ ७ ॥ तुम उसीके पास जाकर विधिपूर्वक अपना मनोवांछित प्रश्न पूछो। वह तुम्हें परम उत्तम धर्मका दर्शन करायेगा; मिथ्या धर्मका उपदेश नहीं करेगा ॥ ७ ॥
स हि सर्वातिथिर्नागो बुद्धिशास्त्रविशारदः ।
गुणैरनुपमैर्युक्तः समस्तैराभिकामिकैः ॥ ८ ॥
वह नाग बड़ा बुद्धिमान् और शास्त्रोंका पण्डित है। सबका अतिथि-सत्कार करता है। समस्त अनुपम तथा वाञ्छनीय सद्गुणोंसे सम्पन्न है ॥ ८ ॥
प्रकृत्या नित्यसलिलो नित्यमध्ययने रतः ।
तपोदमाभ्यां संयुक्तो वृत्तेनानवरेण च ॥ ९ ॥
स्वभाव तो उसका पानीके समान है। वह सदा स्वाध्यायमें लगा रहता है। तप, इन्द्रिय-संयम तथा उत्तम आचार-विचारसे संयुक्त है ॥ ९ ॥
यज्वा दानपतिः क्षान्तो वृत्ते च परमे स्थितः ।
सत्यवागनसूयुश्च शीलवान्नियतेन्द्रियः ॥ १० ॥
वह यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला, दानियोंका शिरोमणि, क्षमाशील, श्रेष्ठ सदाचारमें संलग्न, सत्यवादी, दोषदृष्टिसे रहित, शीलवान् और जितेन्द्रिय है ॥ १० ॥
शेषान्नभोक्ता वचनानुकूलो
हितार्जवोत्कृष्टकृताकृतज्ञः ।
अवैरकृद् भूतहिते नियुक्तो
गङ्गाह्रदाम्भोऽभिजनोपपन्नः ॥ ११ ॥
यज्ञशेष अन्नका वह भोजन करता है, अनुकूल वचन बोलता है, हित और सरलभावसे रहता है। उत्कृष्ट कर्तव्य और अकर्तव्यको जानता है, किसीसे भी वैर नहीं करता है। समस्त प्राणियोंके हितमें लगा रहता है तथा वह गङ्गाजीके समान पवित्र एवं निर्मल कुलमें उत्पन्न हुआ है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५५ ॥
३५६-
षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
अतिथिके वचनोंसे संतुष्ट होकर ब्राह्मणका उसके कथनानुसार नागराजके घरकी ओर प्रस्थान
ब्राह्मण उवाच
अतिभारोऽद्य तस्यैव भारावतरणं महत् ।
पराश्वासकरं वाक्यमिदं मे भवतः श्रुतम् ॥ १ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**अतिथिदेव! मुझपर बड़ा भारी बोझ-सा लदा हुआ था, उसे आज आपने उतार दिया। यह बहुत बड़ा कार्य हो गया। आपकी यह बात जो मैंने सुनी है, दूसरोंको पूर्ण सान्त्वना प्रदान करनेवाली है ॥ १ ॥
अध्वक्लान्तस्य शयनं स्थानक्लान्तस्य चासनम् ।
तृषितस्य च पानीयं क्षुधार्तस्य च भोजनम् ॥ २ ॥
राह चलनेसे थके हुए बटोहीको शय्या, खड़े-खड़े जिसके पैर दुख रहे हों, उसके लिये बैठनेका आसन, प्यासेको पानी और भूखसे पीड़ित मनुष्यको भोजन मिलनेसे जितना संतोष होता है, उतनी ही प्रसन्नता मुझे आपकी यह बात सुनकर हुई है ॥ २ ॥
ईप्सितस्येव सम्प्राप्तिरन्नस्य समयेऽतिथेः ।
एषितस्यात्मनः काले वृद्धस्यैव सुतो यथा ॥ ३ ॥
मनसा चिन्तितस्येव प्रीतिस्निग्धस्य दर्शनम् ।
प्रह्लादयति मां वाक्यं भवता यदुदीरितम् ॥ ४ ॥
भोजनके समय मनोवाञ्छित अन्नकी प्राप्ति होनेसे अतिथिको, समयपर अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे अपने मनको, पुत्रकी प्राप्ति होनेसे वृद्धको तथा मनसे जिसका चिन्तन हो रहा हो, उसी प्रेमी मित्रका दर्शन होनेसे मित्रको जितना आनन्द प्राप्त होता है, आज आपने जो बात कही है, वह मुझे उतना ही आनन्द दे रही है ॥ ३-४ ॥
दत्तचक्षुरिवाकाशे पश्यामि विमृशामि च ।
प्रज्ञानवचनाद्योऽयमुपदेशो हि मे कृतः ॥ ५ ॥
आपने मुझे यह उपदेश क्या दिया, अन्धेको आँख दे दी। आपके इस ज्ञानमय वचनको सुनकर मैं आकाशकी ओर देखता और कर्तव्यका विचार करता हूँ ॥ ५ ॥
बाढमेवं करिष्यामि यथा मे भाषते भवान् ।
इमां हि रजनीं साधो निवस्व मया सह ॥ ६ ॥
प्रभाते यास्यति भवान् पर्याश्वस्तः सुखोषितः ।
असौ हि भगवान् सूर्यो मन्दरश्मिरवाङ्मुखः ॥ ७ ॥
विद्वन्! आप मुझे जैसी सलाह दे रहे हैं, अवश्य ऐसा ही करूँगा। साधो! वे भगवान् सूर्य अस्ताचलकी ओर जा रहे हैं। उनकी किरणें मन्द हो गयी हैं; अतः आप इस रातमें मेरे साथ यहीं रहिये और सुखपूर्वक विश्राम करके भलीभाँति अपनी थकावट दूर कीजिये; फिर सबेरे अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइयेगा॥ ६-७॥
भीष्म उवाच
ततस्तेन कृतातिथ्यः सोऽतिथिः शत्रुसूदन।
उवास किल तां रात्रिं सह तेन द्विजेन वै॥ ८॥
**भीष्मजी कहते हैं—**शत्रुसूदन! तदनन्तर वह अतिथि उस ब्राह्मणका आतिथ्य ग्रहण करके रातभर वहीं उस ब्राह्मणके साथ रहा॥ ८॥
चतुर्थधर्मसंयुक्तं तयोः कथयतोस्तदा।
व्यतीता सा निशा कृत्स्ना सुखेन दिवसोपमा॥ ९॥
मोक्षधर्मके सम्बन्धमें बातें करते हुए उन दोनोंकी वह सारी रात दिनके समान ही बड़े सुखसे बीत गयी॥ ९॥
ततः प्रभातसमये सोऽतिथिस्तेन पूजितः।
ब्राह्मणेन यथाशक्त्या स्वकार्यमभिकाङ्क्षता॥ १०॥
फिर सबेरा होनेपर अपने कार्यकी सिद्धि चाहने-वाले उस ब्राह्मणद्वारा यथाशक्ति सम्मानित हो वह अतिथि चला गया॥ १०॥
ततः स विप्रः कृतकर्मनिश्चयः
कृताभ्यनुज्ञः स्वजनेन धर्मकृत्।
यथोपदिष्टं भुजगेन्द्रसंश्रयं
जगाम काले सुकृतैकनिश्चयः॥ ११॥
तत्पश्चात् वह धर्मात्मा ब्राह्मण अपने अभीष्ट कार्यको पूर्ण करनेका निश्चय करके स्वजनोंकी अनुमति ले अतिथिके बताये अनुसार यथासमय नागराजके घरकी ओर चल दिया। उसने अपने शुभ कार्यको सिद्ध करनेका एक दृढ़ निश्चय कर लिया था॥ ११॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
षट्पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ ३५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका
उपाख्यानविषयक तीन सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५६॥
३५७-
सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नागपत्नीके द्वारा ब्राह्मणका सत्कार और वार्तालापके बाद ब्राह्मणके द्वारा नागराजके आगमनकी प्रतीक्षा
भीष्म उवाच
स वनानि विचित्राणि तीर्थानि च सरांसि च।
अभिगच्छन् क्रमेण स्म कंचिन्मुनिमुपस्थितः॥ १॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वह ब्राह्मण क्रमशः अनेकानेक विचित्र वनों, तीर्थों और सरोवरोंको लाँघता हुआ किसी मुनिके आश्रमपर उपस्थित हुआ॥ १॥
तं स तेन यथोद्दिष्टं नागं विप्रेण ब्राह्मणः।
पर्यपृच्छद् यथान्यायं श्रुत्वैव च जगाम सः॥ २॥
उस मुनिसे ब्राह्मणने अपने अतिथिके बताये हुए नागका पता पूछा। मुनिने जो कुछ बताया, उसे यथावत्रूपसे सुनकर वह पुनः आगे बढ़ा॥ २॥
सोऽभिगम्य यथान्यायं नागायतनमर्थवित्।
प्रोक्तवानहमस्मीति भोःशब्दालंकृतं वचः॥ ३॥
अपने उद्देश्यको ठीक-ठीक समझनेवाला वह ब्राह्मण विधिपूर्वक यात्रा करके नागके घरपर जा पहुँचा। घरके द्वारपर पहुँचकर उसने 'भोः' शब्दसे विभूषित वचन बोलते हुए पुकार लगायी—'कोई है? मैं यहाँ द्वारपर आया हूँ'॥ ३॥
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा रूपिणी धर्मवत्सला।
दर्शयामास तं विप्रं नागपत्नी पतिव्रता॥ ४॥
उसकी वह बात सुनकर धर्मके प्रति अनुराग रखनेवाली नागराजकी परम सुन्दरी पतिव्रता पत्नीने उस ब्राह्मणको दर्शन दिया॥ ४॥
सा तस्मै विधिवत् पूजां चक्रे धर्मपरायणा।
स्वागतेनागतं कृत्वा किं करोमीति चाब्रवीत्॥ ५॥
उस धर्मपरायणा सतीने ब्राह्मणका विधिपूर्वक पूजन किया और स्वागत करते हुए कहा—'ब्राह्मणदेव! आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?'॥ ५॥
ब्राह्मण उवाच
विश्रान्तोऽभ्यर्चितश्चास्मि भवत्या श्लक्ष्णया गिरा।
द्रष्टुमिच्छामि भवति देवं नागमनुत्तमम्॥ ६॥
ब्राह्मणने कहा— देवि! आपने मधुर वाणीसे मेरा स्वागत और पूजन किया। इससे मेरी सारी थकावट दूर हो गयी। अब मैं परम उत्तम नागदेवका दर्शन करना चाहता
हूँ॥ ६ ॥
एतद्धि परमं कार्यमेतन्मे परमेप्सितम् ।
अनेन चार्थेनास्म्यद्य सम्प्राप्तः पन्नगाश्रमम् ॥ ७ ॥
यही मेरा सबसे बड़ा कार्य है और यही मेरा महान् मनोरथ है, मैं इसी उद्देश्यसे आज नागराजके इस आश्रमपर आया हूँ॥ ७ ॥
नागभार्योवाच
आर्यः सूर्यरथं वोढुं गतोऽसौ मासचारिकः ।
सप्ताष्टभिर्दिनैर्विप्र दर्शयिष्यत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
**नागपत्नीने कहा—**विप्रवर! मेरे माननीय पतिदेव सूर्यदेवका रथ ढोनेके लिये गये हुए हैं। वर्षमें एक बार एक मासतक उन्हें यह कार्य करना पड़ता है। पंद्रह दिनोंमें ही वे यहाँ दर्शन देंगे—इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
एतद्विदितमार्यस्य विवासकरणं तव ।
भर्तुर्भवतु किं चान्यत् क्रियतां तद् वदस्व मे ॥ ९ ॥
मेरे पतिदेव-आर्यपुत्रके प्रवासका यह कारण आपको विदित हो। उनके दर्शनके सिवा और क्या काम है? यह मुझे बताइये; जिससे वह पूर्ण किया जाय ॥ ९ ॥
ब्राह्मण उवाच
अनेन निश्चयेनाहं साध्वि सम्प्राप्तवानिह ।
प्रतीक्षन्नागमं देवि वत्स्याम्यस्मिन् महावने ॥ १० ॥
**ब्राह्मणने कहा—**सती-साध्वी देवि! मैं उनके दर्शन करनेका निश्चय करके ही यहाँ आया हूँ; अतः उनके आगमनकी प्रतीक्षा करता हुआ मैं इस महान् वनमें निवास करूँगा ॥ १० ॥
सम्प्राप्तस्यैव चाव्यग्रमावेद्योऽहमिहागतः ।
ममाभिगमनं प्राप्तो वाच्यश्च वचनं त्वया ॥ ११ ॥
जब नागराज यहाँ आ जायँ, तब उन्हें शान्तभावसे यह बतला देना चाहिये कि मैं यहाँ आया हूँ। तुम्हें ऐसी बात उनसे कहनी चाहिये, जिससे वे मेरे निकट आकर मुझे दर्शन दें ॥ ११ ॥
अहमप्यत्र वत्स्यामि गोमत्याः पुलिने शुभे ।
कालं परिमिताहारो यथोक्तं परिपालयन् ॥ १२ ॥
मैं भी यहाँ गोमतीके सुन्दर तटपर परिमित आहार करके तुम्हारे बताये हुए समयकी प्रतीक्षा करता हुआ निवास करूँगा ॥ १२ ॥
ततः स विप्रस्तां नागीं समाधाय पुनः पुनः ।
तदेव पुलिनं नद्याः प्रययौ ब्राह्मणर्षभः ॥ १३ ॥
तदनन्तर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण नागपत्नीको बारंबार (नागराजको भेजनेके लिये) जताकर गोमती नदीके तटपर ही चला गया ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५७ ॥
३५८-
अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना
भीष्म उवाच
अथ तेन नरश्रेष्ठ ब्राह्मणेन तपस्विना ।
निराहारेण वसता दुःखितास्ते भुजङ्गमाः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—नरश्रेष्ठ! तदनन्तर गोमतीके तटपर रहता हुआ वह ब्राह्मण निराहार रहकर तपस्या करने लगा। उसके भोजन न करनेसे वहाँ रहनेवाले नागोंको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ॥
सर्वे सम्भूय सहिता ह्यस्य नागस्य बान्धवाः ।
भ्रातरस्तनया भार्या ययुस्तं ब्राह्मणं प्रति ॥ २ ॥
तब नागराजके भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र सब मिलकर उस ब्राह्मणके पास गये ॥ २ ॥
तेऽपश्यन् पुलिने तं वै विविक्ते नियतव्रतम् ।
समासीनं निराहारं द्विजं जप्यपरायणम् ॥ ३ ॥
उन्होंने देखा, ब्राह्मण गोमतीके तटपर एकान्त प्रदेशमें व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो निराहार बैठा हुआ है और मन्त्रका जप कर रहा है ॥ ३ ॥
ते सर्वे समतिक्रम्य विप्रमभ्यर्च्य चासकृत् ।
ऊचुर्वाक्यमसंदिग्धमातिथेयस्य बान्धवाः ॥ ४ ॥
अतिथि-सत्कारके लिये प्रसिद्ध हुए नागराजके सब भाई-बन्धु ब्राह्मणके पास जा उसकी बारंबार पूजा करके संदेहरहित वाणीमें बोले— ॥ ४ ॥
षष्ठो हि दिवसस्तेऽद्य प्राप्तस्येह तपोधन ।
न चाभिभाषसे किंचिदाहारं धर्मवत्सल ॥ ५ ॥
‘धर्मवत्सल तपोधन! आपको यहाँ आये आज छः दिन हो गये; किंतु अभीतक आप कुछ भोजन लानेके लिये हमें आज्ञा नहीं दे रहे हैं ॥ ५ ॥
अस्मानभिगतश्चासि वयं च त्वामुपस्थिताः ।
कार्यं चातिथ्यमस्माभिर्वयं सर्वे कुटुम्बिनः ॥ ६ ॥
‘आप हमारे घर अतिथिके रूपमें आये हैं और हम आपकी सेवामें उपस्थित हुए हैं। आपका आतिथ्य करना हमारा कर्तव्य है; क्योंकि हम सब लोग गृहस्थ हैं ॥
मूलं फलं वा पर्णं वा पयो वा द्विजसत्तम ।
आहारहेतोरन्नं वा भोक्तुमर्हसि ब्राह्मण ।। ७ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! आप क्षुधाकी निवृत्तिके लिये हमारे लाये हुए फल-मूल, साग, दूध अथवा अन्नको अवश्य ग्रहण करनेकी कृपा करें ।। ७ ।।
त्यक्ताहारेण भवता वने निवसता त्वया ।
बालवृद्धमिदं सर्वं पीड्यते धर्मसंकटात् ।। ८ ।।
‘इस वनमें रहकर आपने भोजन छोड़ दिया है। इससे हमारे धर्ममें बाधा आती है। बालकसे लेकर वृद्धतक हम सब लोगोंको इस बातसे बड़ा कष्ट हो रहा है ।। ८ ।।
न हि नो भ्रूणहा कश्चिज्जातापघ्नृतोऽपि वा ।
पूर्वाशी वा कुले ह्यस्मिन् देवतातिथिबन्धुषु ।। ९ ।।
‘हमारे इस कुलमें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसने कभी भ्रूणहत्या की हो, जिसकी संतान पैदा होकर मर गयी हो, जिसने मिथ्या भाषण किया हो अथवा जो देवता, अतिथि एवं बन्धुओंकों अन्न देनेके पहले ही भोजन कर लेता हो' ।। ९ ।।
ब्राह्मण उवाच
उपदेशेन युष्माकमाहारोऽयं कृतो मया ।
द्विरूनं दशरात्रं वै नागस्यागमनं प्रति ।। १० ।।
**ब्राह्मणने कहा—**नागगण! आपलोगोंके इस उपदेशसे ही मैं तृप्त हो गया। आपलोग ऐसा समझें कि मैंने यह आहार ही प्राप्त कर लिया। नागराजके आनेमें केवल आठ रातें बाकी हैं ।। १० ।।
यद्यष्टरात्रेऽतिक्रान्ते नागमिष्यति पन्नगः ।
तदाहारं करिष्यामि तन्निमित्तमिदं व्रतम् ।। ११ ।।
यदि आठ रात बीत जानेपर भी नागराज नहीं आयेंगे तो मैं भोजन कर लूँगा। उनके आगमनके लिये ही मैंने यह व्रत लिया है ।। ११ ।।
कर्तव्यो न च संतापो गम्यतां च यथागतम् ।
तन्निमित्तमिदं सर्वं नैतद् भेत्तुमिहार्हथ ।। १२ ।।
आपलोगोंको इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये। आप जैसे आये हैं, वैसे ही घर लौट जाइये। नागराजके दर्शनके लिये ही मेरा यह सारा व्रत और नियम है। अतः आपलोग इसे भंग न करें ।। १२ ।।
ते तेन समनुज्ञाता ब्राह्मणेन भुजङ्गमाः ।
स्वमेव भवनं जग्मुरकृतार्था नरर्षभ ।। १३ ।।
नरश्रेष्ठ! उस ब्राह्मणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे नाग अपने प्रयत्नमें असफल हो घरको ही लौट गये ।। १३ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५८ ॥
नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध
एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध
भीष्म उवाच
अथ काले बहुतिथे पूर्णे प्राप्तो भुजङ्गमः ।
दत्ताभ्यनुज्ञः स्वं वेश्म कृतकर्मा विवस्वता ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर कई दिनोंका समय पूरा होनेपर जब नागराजका काम पूरा हो गया, तब सूर्यदेवकी आज्ञा पाकर वे अपने घरको लौटे ॥ १ ॥
तं भार्याप्युपचक्राम पादशौचादिभिर्गुणैः ।
उपपन्नां च तां साध्वीं पन्नगः पर्यपृच्छत ॥ २ ॥
वहाँ नागराजकी पत्नी पैर धोनेके लिये जल—पाद्य आदि उत्तम सामग्रियोंके साथ पतिकी सेवामें उपस्थित हुई। अपनी साध्वी पत्नीको समीप आयी देख नागराजने पूछा— ॥ २ ॥
अथ त्वमसि कल्याणि देवतातथिपूजने ।
पूर्वमुक्तेन विधिना युक्ता युक्तेन मत्समम् ॥ ३ ॥
'कल्याणि! मेरे द्वारा बतायी हुई उपयुक्त विधिसे युक्त हो तुम मेरे ही समान देवताओं और अतिथियोंके पूजनमें तत्पर तो रही हो न? ॥ ३ ॥
न खल्वस्यकृतार्थेन स्त्रीबुद्ध्या मार्दवीकृता ।
मद्वियोगेन सुश्रोणि विमुक्ता धर्मसेतुना ॥ ४ ॥
'सुन्दरि! मेरे वियोगने तुम्हें शिथिल तो नहीं कर दिया था? तुम्हारी स्त्री-बुद्धिके कारण कहीं धर्मकी मर्यादा असफल या अरक्षित तो नहीं रह गयी और उसके कारण तुम धर्म-पालनसे विमुख या दूर तो नहीं हो गयी? ॥ ४ ॥
नागभार्योवाच
शिष्याणां गुरुशुश्रूषा विप्राणां वेदधारणम् ।
भृत्यानां स्वामिवचनं राज्ञो लोकानुपालनम् ॥ ५ ॥
नागपत्नीने कहा—शिष्योंका धर्म है गुरुकी सेवा करना, ब्राह्मणोंका धर्म है वेदोंको धारण करना, सेवकोंका धर्म है स्वामीकी आज्ञाका पालन तथा राजाका धर्म है प्रजावर्गका सतत संरक्षण ॥ ५ ॥
सर्वभूतपरित्राणं क्षत्रधर्म इहोच्यते ।
वैश्यानां यज्ञसंवृत्तिरातिथेयसमन्विता ॥ ६ ॥ इस जगत्में समस्त प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रिय-धर्म बताया जाता है। अतिथि-सत्कारके साथ-साथ यज्ञोंका अनुष्ठान करना वैश्योंका धर्म कहा गया है ॥ ६ ॥
विप्रक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् । गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ॥ ७ ॥ नागराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तीनों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका कर्तव्य बताया गया है और समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखना गृहस्थका धर्म है ॥ ७ ॥
नियताहारता नित्यं व्रतचर्या यथाक्रमम् । धर्मो हि धर्मसम्बन्धादिन्द्रियाणां विशेषतः ॥ ८ ॥ नियमित आहारका सेवन और विधिवत् व्रतका पालन सबका धर्म है। धर्म-पालनके सम्बन्धसे इन्द्रियोंकी विशेषरूपसे शुद्धि होती है ॥ ८ ॥
अहं कस्य कुतो वापि कः को मे ह भवेदिति । प्रयोजनमतिर्नित्यमेवं मोक्षाश्रमे वसेत् ॥ ९ ॥ ‘मैं किसका हूँ? कहाँसे आया हूँ, मेरा कौन है? तथा इस जीवनका प्रयोजन क्या है?’ इत्यादि बातोंका सदा विचार करते हुए ही संन्यासीको संन्यास-आश्रममें रहना चाहिये ॥ ९ ॥
पतिव्रतात्वं भार्यायाः परमो धर्म उच्यते । त्वोपदेशान्नागेन्द्र तच्च तत्त्वेन वेद्मि वै ॥ १० ॥ नागराज! पत्नीके लिये पातिव्रत्य ही सबसे बड़ा धर्म कहा जाता है। आपके उपदेशसे अपने उस धर्मको मैं अच्छी तरह समझती हूँ ॥ १० ॥
साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये त्वयि स्थिते । सत्पथं कथमुत्सृज्य यास्यामि विपथं पथः ॥ ११ ॥ जब आप—मेरे पतिदेव सदा धर्मपर स्थित रहते हैं, तब धर्मको जानती हुई भी मैं कैसे सन्मार्गका त्याग करके कुमार्गपर पैर रखूँगी? ॥ ११ ॥
देवतानां महाभाग धर्मचर्या न हीयते । अतिथीनां च सत्कारे नित्ययुक्तास्म्यतन्द्रिता ॥ १२ ॥ महाभाग! देवताओंकी आराधना Confirmed: आराधनारूप धर्मचर्यामें कोई कमी नहीं आयी है, अतिथियोंके सत्कारमें भी मैं सदा आलस्य छोड़कर लगी रही हूँ ॥ १२ ॥
सप्ताष्टदिवसास्त्वद्य विप्रस्येहागतस्य वै । तच्च कार्यं न मे ख्याति दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ १३ ॥ परंतु आज पंद्रह दिनसे एक ब्राह्मणदेवता यहाँ पधारे हुए हैं। वे मुझसे अपना कोई कार्य नहीं बता रहे हैं। केवल आपका दर्शन चाहते हैं ॥ १३ ॥
गोमत्यास्त्वेष पुलिने त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ।
आसीनो वर्तयन् ब्रह्म ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ १४ ॥
वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण वेदोंका पारायण करते हुए आपके दर्शनके लिये उत्सुक हो गोमतीके किनारे बैठे हुए हैं ॥ १४ ॥
अहं त्वनेन नागेन्द्र सत्यपूर्वं समाहिता ।
प्रस्थाप्यो मत्सकाशं स सम्प्राप्तो भुजगोत्तमः ॥ १५ ॥
नागराज! उन्होंने मुझसे पहले सच्ची प्रतिज्ञा करा ली है कि नागराजके आते ही तुम उन्हें मेरे पास भेज देना ॥ १५ ॥
एतच्छ्रुत्वा महाप्राज्ञ तत्र गन्तुं त्वमर्हसि ।
दातुमर्हसि वा तस्य दर्शनं दर्शनश्रवः ॥ १६ ॥
महाप्राज्ञ नागराज! मेरी यह बात सुनकर अब आपको वहाँ जाना चाहिये और ब्राह्मणदेवताको दर्शन देना चाहिये ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका
उपाख्यानविषयक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५९ ॥
पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना
षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना
नाग उवाच
अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं समनुपश्यसि ।
मानुषं केवलं विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते ॥ १ ॥
नागने पूछा— पवित्र मुसकानवाली देवि! ब्राह्मणरूपमें तुमने किसका दर्शन किया है? वे ब्राह्मण कोई मनुष्य हैं या देवता? ॥ १ ॥
को हि मां मानुषः शक्तो द्रष्टुकामो यशस्विनि ।
संदर्शनरुचिर्वाक्यमाज्ञापूर्वं वदिष्यति ॥ २ ॥
यशस्विनि! भला, कौन मनुष्य मुझे देखनेकी इच्छा कर सकता है और यदि दर्शनकी इच्छा करे भी तो कौन इस तरह मुझे आज्ञा देकर बुला सकता है? ॥ २ ॥
सुरासुरगणानां च देवर्षीणां च भाविनि ।
ननु नागा महावीर्याः सौरसेयास्तरस्विनः ॥ ३ ॥
वन्दनीयाश्च वरदा वयमप्यनुयायिनः ।
मनुष्याणां विशेषेण नावेक्ष्या इति मे मतिः ॥ ४ ॥
भाविनि! सुरसाके वंशज नाग महापराक्रमी और अत्यन्त वेगशाली होते हैं। वे देवताओं, असुरों और देवर्षियोंके लिये भी वन्दनीय हैं। हमलोग भी अपने सेवकको वर देनेवाले हैं। विशेषतः मनुष्योंके लिये हमारा दर्शन सुलभ नहीं है, ऐसी मेरी धारणा है ॥ ३-४ ॥
नागभार्योवाच
आर्जवेन विजानामि नासौ देवोऽनिलाशन ।
एकं तस्मिन् विजानामि भक्तिमानतिरोषण ॥ ५ ॥
नागपत्नी बोली— अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाले वायुभोजी नागराज! उन ब्राह्मणकी सरलतासे तो मैं यही समझती हूँ कि वे देवता नहीं हैं। मुझे उनमें एक बहुत बड़ी विशेषता यह जान पड़ी है कि वे आपके भक्त हैं ॥ ५ ॥
स हि कार्यान्तराकाङ्क्षी जलेप्सुः स्तोकको यथा ।
वर्षं वर्षप्रियः पक्षी दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ ६ ॥
जैसे वर्षाके जलका प्रेमी प्यासा पपीहा पक्षी पानीके लिये वर्षाकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार वे ब्राह्मण किसी दूसरे कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे आपका दर्शन चाहते
हैं ॥ ६ ॥ हित्वा त्वद्दर्शनं किंचिद् विघ्नं न प्रतिपालयेत् । तुल्योऽप्यभिजने जातो न कश्चित् पर्युपासते ॥ ७ ॥ वे आपका दर्शन छोड़कर दूसरी किसी वस्तुको विघ्न समझते हैं; अतः वह विघ्न उन्हें नहीं प्राप्त होना चाहिये। उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ आपके समान कोई सद्गृहस्थ अतिथिकी उपेक्षा करके घरमें नहीं बैठता है ॥ ७ ॥
तद्रोषं सहजं त्यक्त्वा त्वमेनं द्रष्टुमर्हसि । आशाच्छेदेन तस्याद्य नात्मानं दग्धुमर्हसि ॥ ८ ॥ अतः आप अपने सहज रोषको त्यागकर इन ब्राह्मणदेवताका दर्शन कीजिये। आज इनकी आशा भंग करके अपने-आपको भस्म न कीजिये ॥ ८ ॥
आशया ह्यभिपन्नानामकृत्वाश्रुप्रमार्जनम् । राजा वा राजपुत्रो वा भ्रूणहत्यैव युज्यते ॥ ९ ॥ जो आशा लगाकर अपनी शरणमें आये हों, उनके आँसू जो नहीं पोंछता है, वह राजा हो या राजकुमार, उसे भ्रूणहत्याका पाप लगता है ॥ ९ ॥
मौने ज्ञानफलावाप्तिर्दानेन च यशो महत् । वाग्मित्वं सत्यवाक्येन परत्र च महीयते ॥ १० ॥ मौन रहनेसे ज्ञानरूपी फलकी प्राप्ति होती है, दान देनेसे महान् यशकी वृद्धि होती है। सत्य बोलनेसे वाणीकी पटुता और परलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥
भूप्रदानेन च गतिं लभत्याश्रमसम्मिताम् । न्याय्यस्यार्थस्य सम्प्राप्तिं कृत्वा फलमुपाश्नुते ॥ ११ ॥ भूदान करनेसे मनुष्य आश्रम-धर्मके पालनके समान उत्तम गति पाता है। न्यायपूर्वक धनका उपार्जन करके पुरुष श्रेष्ठ फलका भागी होता है ॥ ११ ॥
अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् । न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥ १२ ॥ अपनी रुचिके अनुकूल कर्म भी यदि पापके सम्पर्कसे रहित और अपने लिये हितकर हो तो उसे करके कोई भी नरकमें नहीं पड़ता है। ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ॥ १२ ॥
नाग उवाच
अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान् । रोषः संकल्पजः साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया ॥ १३ ॥ **नागने कहा—**साध्वि! मुझमें अहंकारके कारण अभिमान नहीं है; अपितु जाति-दोषके कारण महान् रोष भरा हुआ है। मेरे उस संकल्पजनित रोषको अब तुमने अपनी वाणीरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ १३ ॥