भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2423

हूँ॥ ६ ॥
एतद्धि परमं कार्यमेतन्मे परमेप्सितम् ।
अनेन चार्थेनास्म्यद्य सम्प्राप्तः पन्नगाश्रमम् ॥ ७ ॥
यही मेरा सबसे बड़ा कार्य है और यही मेरा महान् मनोरथ है, मैं इसी उद्देश्यसे आज नागराजके इस आश्रमपर आया हूँ॥ ७ ॥

नागभार्योवाच
आर्यः सूर्यरथं वोढुं गतोऽसौ मासचारिकः ।
सप्ताष्टभिर्दिनैर्विप्र दर्शयिष्यत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
**नागपत्नीने कहा—**विप्रवर! मेरे माननीय पतिदेव सूर्यदेवका रथ ढोनेके लिये गये हुए हैं। वर्षमें एक बार एक मासतक उन्हें यह कार्य करना पड़ता है। पंद्रह दिनोंमें ही वे यहाँ दर्शन देंगे—इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
एतद्विदितमार्यस्य विवासकरणं तव ।
भर्तुर्भवतु किं चान्यत् क्रियतां तद् वदस्व मे ॥ ९ ॥
मेरे पतिदेव-आर्यपुत्रके प्रवासका यह कारण आपको विदित हो। उनके दर्शनके सिवा और क्या काम है? यह मुझे बताइये; जिससे वह पूर्ण किया जाय ॥ ९ ॥

ब्राह्मण उवाच
अनेन निश्चयेनाहं साध्वि सम्प्राप्तवानिह ।
प्रतीक्षन्नागमं देवि वत्स्याम्यस्मिन् महावने ॥ १० ॥
**ब्राह्मणने कहा—**सती-साध्वी देवि! मैं उनके दर्शन करनेका निश्चय करके ही यहाँ आया हूँ; अतः उनके आगमनकी प्रतीक्षा करता हुआ मैं इस महान् वनमें निवास करूँगा ॥ १० ॥
सम्प्राप्तस्यैव चाव्यग्रमावेद्योऽहमिहागतः ।
ममाभिगमनं प्राप्तो वाच्यश्च वचनं त्वया ॥ ११ ॥
जब नागराज यहाँ आ जायँ, तब उन्हें शान्तभावसे यह बतला देना चाहिये कि मैं यहाँ आया हूँ। तुम्हें ऐसी बात उनसे कहनी चाहिये, जिससे वे मेरे निकट आकर मुझे दर्शन दें ॥ ११ ॥
अहमप्यत्र वत्स्यामि गोमत्याः पुलिने शुभे ।
कालं परिमिताहारो यथोक्तं परिपालयन् ॥ १२ ॥
मैं भी यहाँ गोमतीके सुन्दर तटपर परिमित आहार करके तुम्हारे बताये हुए समयकी प्रतीक्षा करता हुआ निवास करूँगा ॥ १२ ॥
ततः स विप्रस्तां नागीं समाधाय पुनः पुनः ।
तदेव पुलिनं नद्याः प्रययौ ब्राह्मणर्षभः ॥ १३ ॥