महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2419, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस ते परमकं धर्मं न मिथ्या दर्शयिष्यति ॥ ७ ॥ तुम उसीके पास जाकर विधिपूर्वक अपना मनोवांछित प्रश्न पूछो। वह तुम्हें परम उत्तम धर्मका दर्शन करायेगा; मिथ्या धर्मका उपदेश नहीं करेगा ॥ ७ ॥
स हि सर्वातिथिर्नागो बुद्धिशास्त्रविशारदः ।
गुणैरनुपमैर्युक्तः समस्तैराभिकामिकैः ॥ ८ ॥
वह नाग बड़ा बुद्धिमान् और शास्त्रोंका पण्डित है। सबका अतिथि-सत्कार करता है। समस्त अनुपम तथा वाञ्छनीय सद्गुणोंसे सम्पन्न है ॥ ८ ॥
प्रकृत्या नित्यसलिलो नित्यमध्ययने रतः ।
तपोदमाभ्यां संयुक्तो वृत्तेनानवरेण च ॥ ९ ॥
स्वभाव तो उसका पानीके समान है। वह सदा स्वाध्यायमें लगा रहता है। तप, इन्द्रिय-संयम तथा उत्तम आचार-विचारसे संयुक्त है ॥ ९ ॥
यज्वा दानपतिः क्षान्तो वृत्ते च परमे स्थितः ।
सत्यवागनसूयुश्च शीलवान्नियतेन्द्रियः ॥ १० ॥
वह यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला, दानियोंका शिरोमणि, क्षमाशील, श्रेष्ठ सदाचारमें संलग्न, सत्यवादी, दोषदृष्टिसे रहित, शीलवान् और जितेन्द्रिय है ॥ १० ॥
शेषान्नभोक्ता वचनानुकूलो
हितार्जवोत्कृष्टकृताकृतज्ञः ।
अवैरकृद् भूतहिते नियुक्तो
गङ्गाह्रदाम्भोऽभिजनोपपन्नः ॥ ११ ॥
यज्ञशेष अन्नका वह भोजन करता है, अनुकूल वचन बोलता है, हित और सरलभावसे रहता है। उत्कृष्ट कर्तव्य और अकर्तव्यको जानता है, किसीसे भी वैर नहीं करता है। समस्त प्राणियोंके हितमें लगा रहता है तथा वह गङ्गाजीके समान पवित्र एवं निर्मल कुलमें उत्पन्न हुआ है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
पञ्चपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५५ ॥