महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2426, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंआहारहेतोरन्नं वा भोक्तुमर्हसि ब्राह्मण ।। ७ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! आप क्षुधाकी निवृत्तिके लिये हमारे लाये हुए फल-मूल, साग, दूध अथवा अन्नको अवश्य ग्रहण करनेकी कृपा करें ।। ७ ।।
त्यक्ताहारेण भवता वने निवसता त्वया ।
बालवृद्धमिदं सर्वं पीड्यते धर्मसंकटात् ।। ८ ।।
‘इस वनमें रहकर आपने भोजन छोड़ दिया है। इससे हमारे धर्ममें बाधा आती है। बालकसे लेकर वृद्धतक हम सब लोगोंको इस बातसे बड़ा कष्ट हो रहा है ।। ८ ।।
न हि नो भ्रूणहा कश्चिज्जातापघ्नृतोऽपि वा ।
पूर्वाशी वा कुले ह्यस्मिन् देवतातिथिबन्धुषु ।। ९ ।।
‘हमारे इस कुलमें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसने कभी भ्रूणहत्या की हो, जिसकी संतान पैदा होकर मर गयी हो, जिसने मिथ्या भाषण किया हो अथवा जो देवता, अतिथि एवं बन्धुओंकों अन्न देनेके पहले ही भोजन कर लेता हो' ।। ९ ।।
ब्राह्मण उवाच
उपदेशेन युष्माकमाहारोऽयं कृतो मया ।
द्विरूनं दशरात्रं वै नागस्यागमनं प्रति ।। १० ।।
**ब्राह्मणने कहा—**नागगण! आपलोगोंके इस उपदेशसे ही मैं तृप्त हो गया। आपलोग ऐसा समझें कि मैंने यह आहार ही प्राप्त कर लिया। नागराजके आनेमें केवल आठ रातें बाकी हैं ।। १० ।।
यद्यष्टरात्रेऽतिक्रान्ते नागमिष्यति पन्नगः ।
तदाहारं करिष्यामि तन्निमित्तमिदं व्रतम् ।। ११ ।।
यदि आठ रात बीत जानेपर भी नागराज नहीं आयेंगे तो मैं भोजन कर लूँगा। उनके आगमनके लिये ही मैंने यह व्रत लिया है ।। ११ ।।
कर्तव्यो न च संतापो गम्यतां च यथागतम् ।
तन्निमित्तमिदं सर्वं नैतद् भेत्तुमिहार्हथ ।। १२ ।।
आपलोगोंको इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये। आप जैसे आये हैं, वैसे ही घर लौट जाइये। नागराजके दर्शनके लिये ही मेरा यह सारा व्रत और नियम है। अतः आपलोग इसे भंग न करें ।। १२ ।।
ते तेन समनुज्ञाता ब्राह्मणेन भुजङ्गमाः ।
स्वमेव भवनं जग्मुरकृतार्था नरर्षभ ।। १३ ।।
नरश्रेष्ठ! उस ब्राह्मणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे नाग अपने प्रयत्नमें असफल हो घरको ही लौट गये ।। १३ ।।