भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2432

हैं ॥ ६ ॥ हित्वा त्वद्दर्शनं किंचिद् विघ्नं न प्रतिपालयेत् । तुल्योऽप्यभिजने जातो न कश्चित् पर्युपासते ॥ ७ ॥ वे आपका दर्शन छोड़कर दूसरी किसी वस्तुको विघ्न समझते हैं; अतः वह विघ्न उन्हें नहीं प्राप्त होना चाहिये। उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ आपके समान कोई सद्गृहस्थ अतिथिकी उपेक्षा करके घरमें नहीं बैठता है ॥ ७ ॥

तद्रोषं सहजं त्यक्त्वा त्वमेनं द्रष्टुमर्हसि । आशाच्छेदेन तस्याद्य नात्मानं दग्धुमर्हसि ॥ ८ ॥ अतः आप अपने सहज रोषको त्यागकर इन ब्राह्मणदेवताका दर्शन कीजिये। आज इनकी आशा भंग करके अपने-आपको भस्म न कीजिये ॥ ८ ॥

आशया ह्यभिपन्नानामकृत्वाश्रुप्रमार्जनम् । राजा वा राजपुत्रो वा भ्रूणहत्यैव युज्यते ॥ ९ ॥ जो आशा लगाकर अपनी शरणमें आये हों, उनके आँसू जो नहीं पोंछता है, वह राजा हो या राजकुमार, उसे भ्रूणहत्याका पाप लगता है ॥ ९ ॥

मौने ज्ञानफलावाप्तिर्दानेन च यशो महत् । वाग्मित्वं सत्यवाक्येन परत्र च महीयते ॥ १० ॥ मौन रहनेसे ज्ञानरूपी फलकी प्राप्ति होती है, दान देनेसे महान् यशकी वृद्धि होती है। सत्य बोलनेसे वाणीकी पटुता और परलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥

भूप्रदानेन च गतिं लभत्याश्रमसम्मिताम् । न्याय्यस्यार्थस्य सम्प्राप्तिं कृत्वा फलमुपाश्नुते ॥ ११ ॥ भूदान करनेसे मनुष्य आश्रम-धर्मके पालनके समान उत्तम गति पाता है। न्यायपूर्वक धनका उपार्जन करके पुरुष श्रेष्ठ फलका भागी होता है ॥ ११ ॥

अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् । न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥ १२ ॥ अपनी रुचिके अनुकूल कर्म भी यदि पापके सम्पर्कसे रहित और अपने लिये हितकर हो तो उसे करके कोई भी नरकमें नहीं पड़ता है। ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ॥ १२ ॥

नाग उवाच

अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान् । रोषः संकल्पजः साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया ॥ १३ ॥ **नागने कहा—**साध्वि! मुझमें अहंकारके कारण अभिमान नहीं है; अपितु जाति-दोषके कारण महान् रोष भरा हुआ है। मेरे उस संकल्पजनित रोषको अब तुमने अपनी वाणीरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ १३ ॥