महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2433, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंन च रोषादहं साध्वि पश्येयमधिकं तमः । तस्य वक्तव्यतां यान्ति विशेषेण भुजङ्गमाः ॥ १४ ॥ पतिव्रते! मैं रोषसे बढ़कर मोहमें डालनेवाला दूसरा कोई दोष नहीं देखता और क्रोधके लिये सर्प ही अधिक बदनाम हैं ॥ १४ ॥
रोषस्य हि वशं गत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् । तथा शक्रप्रतिस्पर्धी हतो रामेण संयुगे ॥ १५ ॥ इन्द्रसे भी टक्कर लेनेवाला प्रतापी दशानन रावण रोषके ही अधीन होकर युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया ॥ १५ ॥
अन्तःपुरगतं वत्सं श्रुत्वा रामेण निर्हृतम् । धर्षणारोषसंविग्नाः कार्तवीर्यसुता हताः ॥ १६ ॥ ‘होमधेनुके बछड़ेका अपहरण करके उसे राजाके अन्तःपुरमें रख दिया गया है’ ऐसा सुनकर परशुरामजीने तिरस्कारजनक रोषसे भरे हुए कार्तवीर्य-पुत्रोंको मार डाला ॥ १६ ॥
जामदग्न्येन रामेण सहस्रनयनोपमः । संयुगे निहतो रोषात् कार्तवीर्यो महाबलः ॥ १७ ॥ महाबली राजा कार्तवीर्य अर्जुन इन्द्रके समान पराक्रमी था; परंतु रोषके ही कारण जमदग्निनन्दन परशुरामके द्वारा युद्धमें मारा गया ॥ १७ ॥
तदेष तपसां शत्रुः श्रेयसां विनिपातकः । निगृहीतो मया रोषः श्रुत्वैवं वचनं तव ॥ १८ ॥ इसलिये आज तुम्हारी बात सुनकर ही तपस्याके शत्रु और कल्याणमार्गसे भ्रष्ट करनेवाले इस क्रोधको मैंने काबूमें कर लिया है ॥ १८ ॥
आत्मानं च विशेषेण प्रशंसाम्यनपायिनी । यस्य मे त्वं विशालाक्षि भार्या गुणसमन्विता ॥ १९ ॥ विशाललोचने! मैं अपनी एवं अपने सौभाग्यकी विशेषरूपसे प्रशंसा करता हूँ, जिसे तुम-जैसी सद्गुणवती तथा कभी विलग न होनेवाली पत्नी प्राप्त हुई है ॥ १९ ॥
एष तत्रैव गच्छामि यत्र तिष्ठत्यसौ द्विजः । सर्वथा चोक्तवान् वाक्यं स कृतार्थः प्रयास्यति ॥ २० ॥ यह लो, अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ वे ब्राह्मण देवता विराजमान हैं। वे जो कहेंगे वही करूँगा। वे सर्वथा कृतार्थ होकर यहाँसे जायेंगे ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६० ॥