भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2429

वैश्यानां यज्ञसंवृत्तिरातिथेयसमन्विता ॥ ६ ॥ इस जगत्में समस्त प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रिय-धर्म बताया जाता है। अतिथि-सत्कारके साथ-साथ यज्ञोंका अनुष्ठान करना वैश्योंका धर्म कहा गया है ॥ ६ ॥

विप्रक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् । गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ॥ ७ ॥ नागराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तीनों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका कर्तव्य बताया गया है और समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखना गृहस्थका धर्म है ॥ ७ ॥

नियताहारता नित्यं व्रतचर्या यथाक्रमम् । धर्मो हि धर्मसम्बन्धादिन्द्रियाणां विशेषतः ॥ ८ ॥ नियमित आहारका सेवन और विधिवत् व्रतका पालन सबका धर्म है। धर्म-पालनके सम्बन्धसे इन्द्रियोंकी विशेषरूपसे शुद्धि होती है ॥ ८ ॥

अहं कस्य कुतो वापि कः को मे ह भवेदिति । प्रयोजनमतिर्नित्यमेवं मोक्षाश्रमे वसेत् ॥ ९ ॥ ‘मैं किसका हूँ? कहाँसे आया हूँ, मेरा कौन है? तथा इस जीवनका प्रयोजन क्या है?’ इत्यादि बातोंका सदा विचार करते हुए ही संन्यासीको संन्यास-आश्रममें रहना चाहिये ॥ ९ ॥

पतिव्रतात्वं भार्यायाः परमो धर्म उच्यते । त्वोपदेशान्नागेन्द्र तच्च तत्त्वेन वेद्मि वै ॥ १० ॥ नागराज! पत्नीके लिये पातिव्रत्य ही सबसे बड़ा धर्म कहा जाता है। आपके उपदेशसे अपने उस धर्मको मैं अच्छी तरह समझती हूँ ॥ १० ॥

साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये त्वयि स्थिते । सत्पथं कथमुत्सृज्य यास्यामि विपथं पथः ॥ ११ ॥ जब आप—मेरे पतिदेव सदा धर्मपर स्थित रहते हैं, तब धर्मको जानती हुई भी मैं कैसे सन्मार्गका त्याग करके कुमार्गपर पैर रखूँगी? ॥ ११ ॥

देवतानां महाभाग धर्मचर्या न हीयते । अतिथीनां च सत्कारे नित्ययुक्तास्म्यतन्द्रिता ॥ १२ ॥ महाभाग! देवताओंकी आराधना Confirmed: आराधनारूप धर्मचर्यामें कोई कमी नहीं आयी है, अतिथियोंके सत्कारमें भी मैं सदा आलस्य छोड़कर लगी रही हूँ ॥ १२ ॥

सप्ताष्टदिवसास्त्वद्य विप्रस्येहागतस्य वै । तच्च कार्यं न मे ख्याति दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ १३ ॥ परंतु आज पंद्रह दिनसे एक ब्राह्मणदेवता यहाँ पधारे हुए हैं। वे मुझसे अपना कोई कार्य नहीं बता रहे हैं। केवल आपका दर्शन चाहते हैं ॥ १३ ॥

गोमत्यास्त्वेष पुलिने त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ।