भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2414

तदनन्तर उसने वेदोक्त धर्म, शास्त्रोक्त धर्म तथा शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरित धर्म—इन तीन प्रकारके धर्मोंपर मन-ही-मन विचार करना आरम्भ किया— ॥

किन्नु मे स्याच्छुभं कृत्वा किं कृतं किं परायणम् । इत्येवं खिद्यते नित्यं न च याति विनिश्चयम् ।। ७ ।।

‘क्या करनेसे मेरा कल्याण होगा? मेरा क्या कर्तव्य है तथा कौन मेरे लिये परम आश्रय है?’ इस प्रकार वह सदा सोचते-सोचते खिन्न हो जाता था; परंतु किसी निर्णयपर नहीं पहुँच पाता था ।। ७ ।।

तस्यैवं खिद्यमानस्य धर्मं परममास्थितः । कदाचिदतिथिः प्राप्तो ब्राह्मणः सुसमाहितः ।। ८ ।।

एक दिन जब वह इसी तरह सोच-विचारमें पड़ा हुआ कष्ट पा रहा था, उसके यहाँ एक परम धर्मात्मा तथा एकाग्रचित्त ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आ पहुँचा ।। ८ ।।

स तस्मै सत्क्रियां चक्रे क्रियायुक्तेन हेतुना । विश्रान्तं सुसमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ।। ९ ।।

ब्राह्मणने उस अतिथिका क्रियायुक्त हेतु (शास्त्रोक्त विधि) से आदर-सत्कार किया और जब वह सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करने लगा, तब उससे इस प्रकार कहा ।। ९ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने त्रिपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३५३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३५३ ।।