भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1906, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1906

'जिस देहधारीके लिये पलंगकी सेज और भूमि—दोनों समान है; जो अगहनीके चावल और कोदो आदिको एक-सा समझता है, वह मुक्त ही है' ।। ३४ ।।
क्षौमं च कुशचीरं च कौशेयं वल्कलानि च ।
आविकं चर्म च समं यस्य स्यान्मुक्त एव सः ।। ३५ ।।
'जिसके लिये सनके वस्त्र, कुशके चीर, रेशमी वस्त्र, वल्कल, ऊनी वस्त्र और मृगचर्म—सब समान हैं, वह भी मुक्त ही है' ।। ३५ ।।
पञ्चभूतसमुद्भूतं लोकं यश्चानुपश्यति ।
तथा च वर्तते दृष्ट्वा लोकेऽस्मिन् मुक्त एव सः ।। ३६ ।।
'जो संसारको पाञ्चभौतिक देखता और उस दृष्टिके अनुसार ही बर्ताव करता है, वह भी इस जगत्में मुक्त ही है' ।। ३६ ।।
सुखदुःखे समे यस्य लाभालाभौ जयाजयौ ।
इच्छाद्वेषौ भयोद्वेगौ सर्वथा मुक्त एव सः ।। ३७ ।।
'जिसकी दृष्टिमें सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय सम है तथा जिसके इच्छा-द्वेष, भय और उद्वेग सर्वथा नष्ट हो गये हैं, वही मुक्त है' ।। ३७ ।।
रक्तमूत्रपुरीषाणां दोषाणां संचयांस्तथा ।
शरीरं दोषबहुलं दृष्ट्वा चैव विमुच्यते ।। ३८ ।।
'यह शरीर क्या है, बहुत-से दोषोंका भण्डार। इसमें रक्त, मल-मूत्र तथा और भी अनेक दोषोंका संचय हुआ है। जो इस बातको देखता और समझता है, वह मुक्त हो जाता है' ।। ३८ ।।
वलीपलितसंयोगे कार्श्यं वैवर्ण्यमेव च ।
कुब्जभावं च जरया यः पश्यति स मुच्यते ।। ३९ ।।
'बुढ़ापा आनेपर इस शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं। सिरके बाल सफेद हो जाते हैं। देह दुबली-पतली एवं कान्तिहीन हो जाती है तथा कमर झुक जानेके कारण मुनष्य कुबड़ा-सा हो जाता है। इन सब बातोंकी ओर जिसकी सदा ही दृष्टि रहती है, वह मुक्त हो जाता है' ।। ३९ ।।
पुंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोपरमं तथा ।
बाधिर्यं प्राणमन्दत्वं यः पश्यति स मुच्यते ।। ४० ।।
'समय आनेपर पुरुषत्व नष्ट हो जाता है, आँखोंसे दिखायी नहीं देता है, कान बहरे हो जाते हैं और प्राणशक्ति अत्यन्त क्षीण हो जाती है। इन सब बातोंको जो सदा देखता और इनपर विचार करता रहता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है' ।। ४० ।।
गतान्ऋषींस्तथा देवानसुरांश्च तथा गतान् ।
लोकादस्मात् परं लोकं यः पश्यति स मुच्यते ।। ४१ ।।