भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1907, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1907

‘कितने ही ऋषि देवता तथा असुर इस लोकसे परलोकको चले गये। जो सदा यह देखता और स्मरण रखता है वह मुक्त हो जाता है’ ।। ४१ ।।

प्रभावैरन्वितास्तैस्तैः पार्थिवेन्द्राः सहस्रशः ।
ये गताः पृथिवीं त्यक्त्वा इति ज्ञात्वा विमुच्यते ।। ४२ ।।
‘सहस्रों प्रभावशाली नरेश इस पृथिवीको छोड़कर कालके गालमें चले गये। इस बातको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है’ ।। ४२ ।।

अर्थांश्च दुर्भल्लाँल्लोके क्लेशांश्च सुलभांस्तथा ।
दुःखं चैव कुटुम्बार्थे यः पश्यति स मुच्यते ।। ४३ ।।
‘संसारमें धन दुर्लभ है और क्लेश सुलभ। कुटुम्बके पालन-पोषणके लिये भी जहाँ बहुत दुःख उठाना पड़ता है, यह सब जिसकी दृष्टिमें है, वह मुक्त हो जाता है’ ।। ४३ ।।

अपत्यानां च वैगुण्यं जनं विगुणमेव च ।
पश्यन् भूयिष्ठशो लोके को मोक्षं नाभिपूजयेत् ।। ४४ ।।
‘इतना ही नहीं, इस जगत्‌में अपनी संतानोंकी गुणहीनताका दुःख भी देखना पड़ता है। विपरीत गुणवाले मनुष्योंसे भी सम्बन्ध हो जाता है। इस प्रकार जो यहाँ अधिकांश कष्ट ही देखता है, ऐसा कौन मनुष्य मोक्षका आदर नहीं करेगा?’ ।। ४४ ।।

शास्त्राल्लोकाच्च यो बुद्धः सर्वं पश्यति मानवः ।
असारमिव मानुष्यं सर्वथा मुक्त एव सः ।। ४५ ।।
‘जो मनुष्य शास्त्रोंके अध्ययन तथा लौकिक अनुभवसे भी ज्ञानसम्पन्न होकर समस्त मानव-जगत्‌को सारहीन-सा देखता है, वह सब प्रकारसे मुक्त ही है’ ।। ४५ ।।

एतत् श्रुत्वा मम वचो भवांश्चरतु मुक्तवत् ।
गार्हस्थ्ये यदि वा मोक्षे कृता बुद्धिरविक्लवा ।। ४६ ।।
‘मेरे इस वचनको सुनकर तुम अपनी बुद्धिको व्याकुलतासे रहित बनाकर गृहस्थाश्रममें या संन्यास-आश्रममें चाहे जहाँ रहकर मुक्तकी भाँति आचरण करो’ ।।

तत् तस्य वचनं श्रुत्वा सम्यक् स पृथिवीपतिः ।
मोक्षजैश्च गुणैर्युक्तः पालयामास च प्रजाः ।। ४७ ।।
राजा सगर अरिष्टनेमिके उपर्युक्त उपदेशको भलीभाँति सुनकर मोक्षोपयोगी गुणोंसे सम्पन्न हो प्रजाका पालन करने लगे ।। ४७ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि
सगरारिष्टनेमिसंवादेऽष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सगर और अरिष्टनेमिका संवादविषयक दो सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८८ ।।