भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1911, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1911

भीष्म उवाच

पुरा सोऽन्तर्जलगतः स्थाणुभूतो महाव्रतः।
वर्षाणामभवद् राजन् प्रयुतान्यर्बुदानि च॥ २२॥
**भीष्मजीने कहा—**नरेश्वर! प्राचीनकालमें महान् व्रतधारी महादेवजी जलके भीतर ठूँठे काठकी भाँति स्थिर भावसे खड़े हो लाखों-अरबों वर्षोंतक तपस्या करते रहे॥ २२॥
उदतिष्ठत् तपस्तप्त्वा दुश्वरं च महाह्रदात्।
ततो देवातिदेवस्तं ब्रह्मा वै समसर्पत॥ २३॥
वह दुष्कर तपस्या पूरी करके जब वे जलके उस महान् सरोवरसे बाहर निकले, तब देवदेव ब्रह्माजी उनके पास गये॥ २३॥
तपोवृद्धिमपृच्छच्च कुशलं चैवमव्ययः।
तपः सुचीर्णमिति च प्रोवाच वृषभध्वजः॥ २४॥
अविनाशी ब्रह्माजीने उनकी तपोवृद्धिका कुशल-समाचार पूछा। तब भगवान् वृषभध्वजने यह बताया कि 'मेरी तपस्या भलीभाँति सम्पन्न हो गयी'॥ २४॥
तत्संयोगेन बुद्धिं चाप्यपश्यत् स तु शंकरः।
महामतिरचिन्त्यात्मा सत्यधर्मरतः सदा॥ २५॥
तत्पश्चात् परम् बुद्धिमान्, अचिन्त्यस्वरूप और सदा सत्यधर्मपरायण महादेवजीने अपनी तपस्याके सम्पर्कसे उशनाकी तपस्यामें भी वृद्धि हुई देखी॥ २५॥
स तेनाढ्यो महायोगी तपसा च धनेन च।
व्यराजत महाराज त्रिषु लोकेषु वीर्यवान्॥ २६॥
महाराज! महायोगी उशना उस तपस्यारूप धनसे सम्पन्न एवं शक्तिशाली हो तीनों लोकोंमें प्रकाशित होने लगे॥ २६॥
ततः पिनाकी योगात्मा ध्यानयोगं समाविशत्।
उशना तु समुद्विग्नो निलिल्ये जठरे ततः॥ २७॥
तदनन्तर पिनाकधारी योगी महादेवने ध्यान लगाया। उस समय उशना अत्यन्त उद्विग्न हो उनके उदरमें ही विलीन होने लगे॥ २७॥
तुष्टाव च महायोगी देवं तत्रस्थ एव च।
निःसारं काङ्क्षमाणः स तेन स्म प्रतिहन्यते॥ २८॥
महायोगी उशनाने वहीं रहकर महादेवजीकी स्तुति की। वे निकलनेका मार्ग चाहते थे; परंतु महादेवजी उनकी गतिको प्रतिहत कर देते थे॥ २८॥
उशना तु तथोवाच जठरस्थो महामुनिः।
प्रसादं मे कुरुष्वेति पुनः पुनररिंदम॥ २९॥
शत्रुदमन नरेश! तब उदरमें ही रहकर महामुनि उशनाने महादेवजीसे बारंबार प्रार्थना की—'प्रभो! मुझपर कृपा कीजिये'॥ २९॥

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