भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1912, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1912

तमुवाच महादेवो गच्छ शिश्नेन मोक्षणम् । इति सर्वाणि स्रोतांसि रुद्ध्वा त्रिदशपुङ्गवः ॥ ३० ॥ तब महादेवजीने उनसे कहा—'शिश्नके मार्गसे ही तुम्हारा उद्धार होगा, अतः उसीसे निकलो।' ऐसा कहकर देवेश्वर शिवने अन्य सारे द्वार रोक दिये ॥ ३० ॥ अपश्यमानस्तद् द्वारं सर्वतः पिहितो मुनिः । पर्यक्रामद् दह्यमान इतश्चेतश्च तेजसा ॥ ३१ ॥ सब ओरसे घिरे हुए मुनिवर उशना उस शिश्नद्वारको देख नहीं पाते थे। अतः भगवान् शंकरके तेजसे दग्ध होते हुए वे उदरमें ही इधर-उधर चक्कर काटने लगे ॥ ३१ ॥ स वै निष्क्रम्य शिश्नेन शुक्रत्वमभिपेदिवान् । कार्येण तेन नभसो नाध्यगच्छत मध्यतः ॥ ३२ ॥ तत्पश्चात् वे शिश्नके द्वारसे निकलकर सहसा बाहर आ गये। उस द्वारसे निकलनेके कारण ही उनका नाम शुक्र (वीर्य) हो गया। यही कारण है जिससे वे आकाशके बीचसे होकर नहीं निकलते ॥ ३२ ॥ विनिष्क्रान्तं तु तं दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव तेजसा । भवो रोषसमाविष्टः शूलोद्यतकरः स्थितः ॥ ३३ ॥ बाहर निकलनेपर शुक्र अपने तेजसे प्रज्वलित-से हो रहे थे। उन्हें उस अवस्थामें देखकर हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हुए भगवान् शिव पुनः रोषसे भर गये ॥ ३३ ॥ अवारयत तं देवी क्रुद्धं पशुपतिं पतिम् । पुत्रत्वमगमद् देव्या वारिते शंकरे च सः ॥ ३४ ॥ उस समय देवी पार्वतीने कुपित हुए अपने पतिदेव भगवान् पशुपतिको रोका। देवीके द्वारा भगवान् शंकरके रोक दिये जानेपर शुक्राचार्य उनके पुत्रभावको प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥

देव्युवाच

हिंसनीयस्त्वया नैव मम पुत्रत्वमागतः । न हि देवोदरात् कश्चिन्निःसृतो नाशमृच्छति ॥ ३५ ॥ **देवी पार्वतीने कहा—**प्रभो! अब यह शुक्र मेरा पुत्र हो गया; अतः आपको इसका विनाश नहीं करना चाहिये। देव! जो आपके उदरसे निकला हो, ऐसा कोई भी पुरुष विनाशको नहीं प्राप्त हो सकता ॥ ३५ ॥ ततः प्रीतो भवो देव्याः प्रहसंश्चेदमब्रवीत् । गच्छत्वेष यथाकाममिति राजन् पुनः पुनः ॥ ३६ ॥ राजन्! यह सुनकर महादेवजी पार्वतीपर बहुत प्रसन्न हुए और हँसते हुए बारंबार कहने लगे—'अब यह जहाँ चाहे जा सकता है' ॥ ३६ ॥ ततः प्रणम्य वरदं देवं देवीमुमां तथा ।