महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1921, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपापकर्मको अहिंसाका व्रत भी दूर नहीं कर सकता। ऐसा वेदशास्त्रोंके ज्ञाता, वेदका उपदेश देनेवाले ब्राह्मणोंका कथन है ॥ १२-१३ ॥
अहं तु तावत् पश्यामि कर्म यद् वर्तते कृतम् । गुणयुक्तं प्रकाशं वा पापेनानुपसंहितम् ॥ १४ ॥
परंतु मैं तो ऐसा देखता हूँ कि जो कर्म किया गया है वह पुण्य हो या पापयुक्त, प्रकटरूपमें किया गया हो या छिपाकर (तथा जान-बूझकर किया गया हो या अनजानमें), वह अपना फल अवश्य देता ही है ॥ १४ ॥
यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम् । बुद्धियुक्तानि तानीह कृतानि मनसा सह ॥ १५ ॥ भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्बणम् । अबुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा ॥ १६ ॥
धर्मज्ञ राजा जनक! जैसे मनसे सोच-विचारकर बुद्धिद्वारा निश्चय करके जो स्थूल या सूक्ष्म कर्म यहाँ किये जाते हैं वे यथायोग्य फल अवश्य देते हैं। उसी प्रकार हिंसा आदि उग्र कर्मके द्वारा अनजानमें किया हुआ भयंकर पाप यदि सदा बनता रहे तो उसका फल भी मिलता ही है; अन्तर इतना ही है कि जान-बूझकर किये हुए कर्मकी अपेक्षा उसका फल बहुत कम हो जाता है ॥ १५-१६ ॥
कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभिस्तथा । न चरेत् तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत् ॥ १७ ॥
देवताओं और मुनियोंद्वारा जो अनुचित कर्म किये गये हों धर्मात्मा पुरुष उनका अनुकरण न करे; और उन कर्मोंको सुनकर भी उन देवता आदिकी निन्दा भी न करे ॥ १७ ॥
संचिन्त्य मनसा राजन् विदित्वा शक्यमात्मनः । करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ॥ १८ ॥
राजन्! जो मनुष्य मनसे खूब सोच-विचारकर, 'अमुक काम मुझसे हो सकेगा या नहीं'—इसका निश्चय करके शुभकर्मका अनुष्ठान करता है, वह अवश्य ही अपनी भलाई देखता है ॥ १८ ॥
नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीयते यथा । नवेतरे तथाभावं प्राप्नोति सुखभावितम् ॥ १९ ॥
जैसे नये बने हुए कच्चे घड़ेमें रखा हुआ जल नष्ट हो जाता है, परंतु पके-पकाये घड़ेमें रखा हुआ ज्यों-का-त्यों बना रहता है, उसी प्रकार परिपक्व विशुद्ध अन्तःकरणमें सम्पादित सुखदायक शुभकर्म निश्चल रहते हैं ॥ १९ ॥
सतोयेऽन्यत् तु यत् तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते । वृद्धे वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ॥ २० ॥