महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपारिबर्हैः सुसंयुक्तमुद्यतं तुल्यतां गतम् । अतिक्रमेत् तं नृपतिः संग्रामे क्षत्रियात्मजम् ॥ ५ ॥ किंतु जिसके पास युद्धका सामान हो, जो युद्धके लिये तैयार हो और अपने बराबरका हो, संग्रामभूमिमें उस क्षत्रियकुमारको राजा अवश्य जीतनेका प्रयत्न करे ॥ ५ ॥
तुल्यादिह वधः श्रेयान् विशिष्टाच्चेति निश्चयः । निहीनात् कातराच्चैव कृपणाद् गर्हितो वधः ॥ ६ ॥ अपने समान या अपनी अपेक्षा बड़े वीरके हाथसे वध होना श्रेष्ठ है, ऐसा युद्ध-शास्त्रके ज्ञाताओंका निश्चय है। अपनेसे हीन, कातर तथा दीन पुरुषके हाथसे होनेवाली मृत्यु निन्दित है ॥ ६ ॥
पापात् पापसमाचारान्निहीनाच्च नराधिप । पाप एव वधः प्रोक्तो नरकायेति निश्चयः ॥ ७ ॥ नरेश्वर! पापी, पापाचारी और हीन मनुष्यके हाथसे जो वध होता है, वह पापरूप ही बताया गया है तथा वह नरकमें गिरानेवाला है, यही शास्त्रका निश्चय है ॥ ७ ॥
न कश्चित् त्राति वै राजन् दिष्टान्तवशमागतम् । सावशेषायुषं चापि कश्चिन्नैवापकर्षति ॥ ८ ॥ राजन्! मृत्युके वशमें पड़े हुए प्राणीको कोई बचा नहीं सकता और जिसकी आयु शेष है, उसे कोई मार भी नहीं सकता ॥ ८ ॥
स्निग्धैश्च क्रियमाणानि कर्माणीह निवर्तयेत् । हिंसात्मकानि सर्वाणि नायुरिच्छेत् परायुषा ॥ ९ ॥ मनुष्यको चाहिये कि उसके प्रियजन यदि कोई हिंसात्मक कर्म उसके लिये करते हों तो वह उन सब कर्मोंको रोक दे। दूसरेकी आयुसे अपनी आयु बढ़ानेकी अर्थात् दूसरोंके प्राण लेकर अपने प्राण बचानेकी इच्छा न करे ॥ ९ ॥
गृहस्थानां तु सर्वेषां विनाशमभिकाङ्क्षताम् । निधनं शोभनं तात पुलिनेषु क्रियावताम् ॥ १० ॥ तात! मरनेकी इच्छावाले समस्त गृहस्थोंके लिये तो वही मृत्यु सबसे उत्तम मानी गयी है, जो गंगादि पवित्र नदियोंके तटोंपर शुभकर्मोंका अनुष्ठान करते हुए प्राप्त हो ॥ १० ॥
आयुषि क्षयमापन्ने पञ्चत्वमुपगच्छति । तथा ह्यकारणाद् भवति कारणैरुपपादितम् ॥ ११ ॥ जब आयु समाप्त हो जाती है तभी देहधारी जीव पंचत्वको प्राप्त होता है। यह बिना कारणके भी हो जाता है और कभी विभिन्न कारणोंसे उपपादित होता है ॥ ११ ॥
तथा शरीरं भवति देहाद् येनोपपादितम् । अध्वानं गतकश्चायं प्राप्तश्चायं गृहाद् गृहम् ॥ १२ ॥