महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextजो लोग देहको पाकर हठपूर्वक उसका परित्याग कर देते हैं, उनको पूर्ववत् ही यातनामय शरीरकी प्राप्ति होती है। ऐसे लोग (मोक्षके साधनरूप मनुष्यशरीरको पाकर भी आत्महत्याके कारण उस लाभसे वंचित हो) एक घरसे दूसरे घरमें जानेवाले मनुष्यके समान एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होते हैं ॥ १२ ॥
द्वितीयं कारणं तत्र नान्यत् किंचन विद्यते । तद् देहं देहिनां युक्तं पञ्चभूतेषु वर्तते ॥ १३ ॥ इनकी उस अवस्थाके प्राप्त होनेमें आत्महत्यरूप पापके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं है। उन प्राणियोंको उस शरीरका मिलना उचित ही है, जो कि पंचभूतमय है ॥ १३ ॥
शिरास्नावस्थिसंघातं बीभत्सामेध्यसंकुलम् । भूतानामिन्द्रियाणां च गुणानां च समागमम् ॥ १४ ॥ यह शरीर नस, नाड़ी और हड्डियोंका समूह है। घृणित और अपवित्र मल-मूत्र आदिसे भरा हुआ है। पंचमहाभूतों, श्रोत्र आदि इन्द्रियों तथा गुणों (वासनामय विषयों) का समुदाय है ॥ १४ ॥
त्वगन्तं देहमित्याहुर्विद्वांसोऽध्यात्मचिन्तकाः । गुणैरपि परिक्षीणं शरीरं मर्त्यतां गतम् ॥ १५ ॥ अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि इस शरीरके अन्तमें अर्थात् बाह्यभागमें त्वचा (चमड़ा) मात्र है। यह सौन्दर्य आदि गुणोंसे भी रहित है। इसकी मृत्यु अनिवार्य है ॥ १५ ॥
शरीरिणा परित्यक्तं निश्चेष्टं गतचेतनम् । भूतैः प्रकृतिमापन्नैस्ततो भूमौ निमज्जति ॥ १६ ॥ जब जीवात्मा इस देहका परित्याग कर देता है, तब यह देह निश्चेष्ट और चेतनाशून्य हो जाती है एवं इसके पाँच भूत अपनी-अपनी प्रकृतिके साथ मिल जाते हैं। फिर तो यह पृथ्वीमें निमग्न हो जाती है ॥ १६ ॥
भावितं कर्मयोगेन जायते तत्र तत्र ह । इदं शरीरं वैदेह म्रियते यत्र यत्र ह । तत्स्वभावोऽपरो दृष्टो विसर्गः कर्मणस्तथा ॥ १७ ॥ विदेहराज! यह शरीर जिस किसी स्थानमें मृत्युको प्राप्त हो जाता है; फिर प्रारब्धकर्मके योगसे भावित होकर जहाँ-कहीं भी जन्म ले लेता है। कर्मोंका फलस्वरूप यह स्वभावसिद्ध पुनर्जन्म देखा गया है ॥ १७ ॥
न जायते तु नृपते कंचित् कालमयं पुनः । परिभ्रमति भूतात्मा द्यामिवाम्बुधरो महान् ॥ १८ ॥ नरेश्वर! जैसे विशाल मेघ आकाशमें सब ओर भ्रमण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा प्रारब्ध-कर्मके फलसे कुछ कालतक घूमता रहता है, जन्म नहीं लेता है ॥ १८ ॥