महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextराजन्! जो मनुष्य वेदमें श्रद्धा रखनेवाला न हो, उसे इस उत्तम ज्ञानका उपदेश तुम्हें नहीं करना चाहिये। जिसे बोधके लिये अधिक प्यास हो तथा जो जिज्ञासुभावसे शरणमें आया हो, वही इस उपदेशको सुननेका अधिकारी है ॥ ३२ ॥
न देयमेतच्च तथानृतात्मने शठाय क्लीबाय न जिह्मबुद्धये । न पण्डितज्ञानपरोपतापिने देयं तु देयं च निबोध यादृशे ॥ ३३ ॥
असत्यवादी, शठ, नीच, कपटी, अपनेको पण्डित माननेवाले और दूसरेको कष्ट पहुँचानेवाले मनुष्यको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। कैसे पुरुषको इस ज्ञानका उपदेश देना और अवश्य देना चाहिये—यह भी सुन लो ॥ ३३ ॥
श्रद्धान्वितायाथ गुणान्विताय परापवादाद् विरताय नित्यम् । विशुद्धयोगाय बुधाय नित्यं क्रियावते च क्षमिणे हिताय ॥ ३४ ॥ विविक्तशीलाय विधिप्रियाय विवादहीनाय बहुश्रुताय । विजानते चैव न चाहितक्षमे दमे च शक्ताय शमे च देयम् ॥ ३५ ॥
श्रद्धालु, गुणवान्, परनिन्दासे सदा दूर रहनेवाले, विशुद्ध योगी, विद्वान्, सदा शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले, क्षमाशील, सबके हितैषी, एकान्तवासी, शास्त्रविधिका आदर करनेवाले, विवादहीन, बहुज्ञ, विज्ञ, किसीका अहित न करनेवाले तथा इन्द्रियसंयम एवं मनोनिग्रहमें समर्थ पुरुषको ही इस ज्ञानका उपदेश देना चाहिये ॥
एतैर्गुणैर्हीनतमे न देय- मेतत् परं ब्रह्म विशुद्धमाहुः । न श्रेयसा योक्ष्यति तादृशे कृतं धर्मप्रवक्तारमपात्रदानात् ॥ ३६ ॥
जो इन सद्गुणोंसे अत्यन्त हीन हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। यह ज्ञान विशुद्ध परब्रह्मस्वरूप बताया गया है। वैसे गुणहीन पुरुषको दिया हुआ यह ज्ञान उसके लिये कल्याणकारी नहीं होगा तथा कुपात्रको उपदेश देनेसे वह वक्ताका भी कल्याण नहीं करेगा ॥ ३६ ॥
पृथ्वीमिमां यद्यपि रत्नपूर्णां दद्यान्न देयं त्विदमव्रताय । जितेन्द्रियायैतदसंशयं ते