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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 2047 of 2450

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Page 2047

भवेत् प्रदेयं परमं नरेन्द्र ॥ ३७ ॥ नरेन्द्र! जिसने व्रत और नियमोंका पालन न किया हो, वह यदि रत्नोंसे भरी हुई इस सारी पृथ्वीका राज्य दे तो भी उसे इस ज्ञानका उपदेश नहीं देना चाहिये। परंतु जितेन्द्रिय पुरुषको निस्संदेह इस परम उत्तम ज्ञानका उपदेश देना तुझे उचित है ॥ ३७ ॥ कराल मा ते भयमस्तु किञ्चि- देतच्छ्रुतं ब्रह्म परं त्वयाद्य । यथावदुक्तं परमं पवित्रं विशोकमत्यन्तमनादिमध्यम् ॥ ३८ ॥ अगाधजन्मामरणं च राजन् निरामयं वीतभयं शिवं च । समीक्ष्य मोहं त्यज वाद्य सर्व- ज्ञानस्य तत्त्वार्थमिदं विदित्वा ॥ ३९ ॥ कराल! तुमने मुझसे आज परब्रह्मका ज्ञान सुना है; अतः तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये। वह परब्रह्म परम पवित्र, शोकरहित, आदि, मध्य और अन्तसे शून्य, जन्म-मृत्युसे बचानेवाला, निरामय, निर्भय तथा कल्याणमय है। राजन्! उसका मैंने यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया है। वही सम्पूर्ण ज्ञानोंका तात्त्विक अर्थ है। ऐसा जानकर उसका ज्ञान प्राप्त करके आज मोहका परित्याग कर दो ॥ ३८-३९ ॥ अवाप्तमेतद्धि मया सनातना- द्धिरण्यगर्भाद् गदतो नराधिप । प्रसाद्य यत्नेन तमुग्रचेतसं सनातनं ब्रह्म यथाद्य वै त्वया ॥ ४० ॥ नरेश्वर! जिस प्रकार आज तुमने मुझसे सनातन ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त किया है; इसी प्रकार मैंने भी हिरण्यगर्भ नामसे प्रसिद्ध सनातन उग्रचेता ब्रह्माजीके मुखसे, उन्हें बड़े यत्नसे प्रसन्न करके इसे प्राप्त किया था ॥ ४० ॥ पृष्टस्त्वया चास्मि यथा नरेन्द्र यथा मयेदं त्वयि चोक्तमद्य । तथावाप्तं ब्रह्मणो मे नरेन्द्र महाज्ञानं मोक्षविदां परायणम् ॥ ४१ ॥ नरेन्द्र! जैसे तुमने मुझसे पूछा है और जैसे मैंने तुम्हारे प्रति आज इस ज्ञानका उपदेश किया है, उसी प्रकार मैंने भी ब्रह्माजीसे प्रश्न करके उनके मुखसे इस महान् ज्ञानको प्राप्त किया है। यह मोक्ष ज्ञानियोंका परम आश्रय है ॥ ४१ ॥

भीष्म उवाच