महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextएतदुक्तं परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः ।
पञ्चविंशो महाराज परमर्षिनिदर्शनात् ॥ ४२ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**महाराज! महर्षि वसिष्ठके बताये अनुसार यह परब्रह्मका स्वरूप मैंने तुम्हें बताया है, जिसे पाकर जीवात्मा फिर इस संसारमें नहीं लौटता ॥
पुनरावृत्तिमाप्नोति परं ज्ञानमवाप्य च ।
नावबुध्यति तत्त्वेन बुध्यमानोऽजरामरम् ॥ ४३ ॥
जो इस उत्तम ज्ञानको गुरुके मुखसे पाकर भी भलीभाँति समझता नहीं है, वह पुनरावृत्ति (बारंबार आवागमन) को प्राप्त होता है और जो इसे तत्त्वतः समझ लेता है, वह जरा-मृत्युसे रहित परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥
एतन्निःश्रेयसकरं ज्ञानं ते परमं मया ।
कथितं तत्त्वतस्तात श्रुत्वा देवर्षितो नृप ॥ ४४ ॥
तात! नरेश्वर! यह परम कल्याणकारी उत्तम ज्ञान मैंने देवर्षि नारदजीके मुँहसे सुना था। जिसे यथार्थरूपसे तुम्हें भी बताया है ॥ ४४ ॥
हिरण्यगर्भादृषिणा वसिष्ठेन महात्मना ।
वसिष्ठादृषिशार्दूलान्नारदोऽवाप्तवानिदम् ॥ ४५ ॥
नारदाद् विदितं मह्यमेतद् ब्रह्म सनातनम् ।
मा शुचः कौरवेन्द्र त्वं श्रुत्वैतत् परमं पदम् ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीसे महात्मा वसिष्ठ मुनिने यह ज्ञान प्राप्त किया था। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे यह नारदजीको उपलब्ध हुआ और नारदजीसे मुझे यह सनातन ब्रह्मका उपदेश प्राप्त हुआ है। कौरवनरेश! यह ज्ञान परमपद है। इसे सुनकर अब तुम शोकका त्याग कर दो ॥ ४५-४६ ॥
येन क्षराक्षरे वित्ते भयं तस्य न विद्यते ।
विद्यते तु भयं तस्य यो नैतद् वेत्ति पार्थिव ॥ ४७ ॥
पृथ्वीनाथ! जिसने क्षर और अक्षरके तत्त्वको जान लिया है, उसमें किसी प्रकारका भी भय नहीं होता। जो इसे नहीं जानता, उसीमें भय रहता है ॥ ४७ ॥
अविज्ञानाच्च मूढात्मा पुनः पुनरुपाद्रवत् ।
प्रेत्य जातिसहस्राणि मरणान्तान्युपाश्नुते ॥ ४८ ॥
मूर्ख मनुष्य इस तत्त्वको न जाननेके कारण बारंबार संसारमें आता है और हजारों योनियोंमें जन्म-मरणके कष्टका अनुभव करता है ॥ ४८ ॥
देवलोकं तथा तिर्यङ्मनुष्यमपि चाश्नुते ।
यदि शुध्यति कालेन तस्मादज्ञानसागरात् ॥ ४९ ॥
(उत्तीर्णोऽस्मादगाधात् स परमाप्नोति शोभनम् ।)