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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 2061 of 2450

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Page 2061

ते वध्यमाना ह्यन्योन्यं गुणैर्हारिभिरव्ययैः ॥ १४ ॥ पृथ्वीनाथ! प्रवाहरूपसे सदा विद्यमान रहनेवाले इन मनोहर शब्द आदि विषयोंसे आविष्ट होकर सभी प्राणी प्रतिदिन कभी एक-दूसरेको चाहते हैं, कभी पारस्परिक हितसाधनमें तत्पर रहते हैं, कभी एक-दूसरेको नीचा दिखानेकी चेष्टा करते हैं, कभी आपसमें ईर्ष्या रखते हैं और कभी परस्पर प्रहार भी कर बैठते हैं ॥ १३-१४ ॥

इहैव परिवर्तन्ते तिर्यग्योनिप्रवेशिनः । त्रीणि कल्पसहस्राणि एतेषामहरुच्यते ॥ १५ ॥ रात्रिरेतावती चैव मनसश्च नराधिप । ऐसे विषयासक्त प्राणी तिर्यग्योनियोंमें प्रवेश करके इसी संसारमें चक्कर काटते रहते हैं। इन शब्दादि विषयोंका एक दिन तीन हजार कल्पोंका बताया जाता है। नरेश्वर! इनकी रात भी इतनी ही बड़ी है। मनके भी दिन-रातका परिमाण इतना ही है ॥ १५ १/२ ॥

मनश्चरति राजेन्द्र चारितं सर्वमिन्द्रियैः ॥ १६ ॥ न चेन्द्रियाणि पश्यन्ति मन एवानुपश्यति । चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा तु न चक्षुषा ॥ १७ ॥ राजेन्द्र! मन इन्द्रियोंद्वारा संचालित होकर सब विषयोंकी ओर जाता है। इन्द्रियाँ उन विषयोंको नहीं देखतीं, मन ही उन्हें निरन्तर देखता है। आँख मनके सहयोगसे ही रूपका दर्शन करती है, अपनी शक्तिसे नहीं ॥ १६-१७ ॥

मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति । तथेन्द्रियाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते ॥ १८ ॥ जिस समय मन व्यग्र रहता है, उस समय आँख देखती हुई भी नहीं देख पाती। लोग भ्रमवश ही ऐसा कहते हैं कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विषयोंको प्रत्यक्ष करती हैं ॥ १८ ॥

न चेन्द्रियाणि पश्यन्ति मन एवात्र पश्यति । मनस्युपरते राजन्निन्द्रियोपरमो भवेत् ॥ १९ ॥ किंतु इन्द्रियाँ कुछ नहीं देखतीं, केवल मन ही देखता है। राजन्! मन विषयोंसे उपरत हो जाय तो इन्द्रियाँ भी विषयोंसे निवृत्त हो जाती हैं ॥ १९ ॥

न चेन्द्रियव्युपरमे मनस्युपरमो भवेत् । एवं मनःप्रधानानि इन्द्रियाणि प्रभावयेत् ॥ २० ॥ परंतु इन्द्रियोंके उपरत होनेपर मनमें उपरति नहीं आती। इस प्रकार यह निश्चय करना चाहिये कि सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें मन ही प्रधान है ॥ २० ॥

इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते । एतद् विशन्ति भूतानि सर्वाणीह महायशः ॥ २१ ॥ मनको सम्पूर्ण इन्द्रियोंका स्वामी कहा जाता है। महायशस्वी नरेश! जगत्के समस्त प्राणी इस मनका ही आश्रय लेते हैं ॥ २१ ॥