महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextवेदों और वेदांगोंके पारंगत विद्वान् ब्रह्माजीकी भी कालसंख्याका विचार करते हुए कहते हैं कि दस हजार कल्पोंमेंसे एक चौथाई कम कर देनेपर जितना शेष रहता है, उतना ही ब्रह्माजीके एक दिनका मान है अर्थात् साढ़े सात हजार कल्पोंका उनका एक दिन होता है ।। ६ ।।
रात्रिमेतावतीं चास्य प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः ।
सृजत्यहङ्कारमृषिर्भूतं दिव्यात्मकं तथा ।। ७ ।।
अध्यात्मतत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले विद्वानोंका कथन है कि ब्रह्माजीकी रात्रि भी इतनी ही बड़ी है। महान् ऋषि ब्रह्मा अहंकार नामक दिव्य भूतकी सृष्टि करते हैं ।। ७ ।।
चतुरश्चापरान् पुत्रान् देहात् पूर्वं महर्षिः ।
ते वै पितॄणां पितरः श्रूयन्ते राजसत्तम ।। ८ ।।
नृपश्रेष्ठ! महान् ऋषि ब्रह्माने पूर्वकालमें भौतिक देहकी उत्पत्तिसे पहले चार अन्य पुत्रोंको उत्पन्न किया (जिनके नाम ये हैं—बुद्धि, अहंकार, मन और चित्त)। वे चारों पुत्र 'पितरोंके भी पितर' अर्थात् पञ्चमहाभूतोंके भी जनक सुने जाते हैं ।। ८ ।।
देवाः पितॄणां च सुता देवैर्लोकाः समावृताः ।
चराचरा नरश्रेष्ठ इत्येवमनुशुश्रुम ।। ९ ।।
नरश्रेष्ठ! देवता (श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ) पितरों (पञ्चमहाभूतों) के पुत्र हैं अर्थात् सारी इन्द्रियाँ पञ्च-महाभूतोंसे ही उत्पन्न हुई हैं और वे समस्त चराचर जगत्का आश्रय लेकर स्थित हैं, ऐसा हमने सुना है ।।
परमेष्ठी त्वहङ्कारः सृजन् भूतानि पञ्चधा ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।। १० ।।
स्रष्टाके उत्तम पदपर प्रतिष्ठित हुआ अहंकार आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—इन पाँच प्रकारके भूतोंकी सृष्टि करता है ।। १० ।।
एतस्यापि निशामारुस्तृतीयमिह कुर्वतः ।
पञ्चकल्पसहस्राणि तावदेवाहरुच्यते ।। ११ ।।
इस तृतीय भौतिक सर्गकी सृष्टि करनेवाले अहंकारकी रात्रि पाँच हजार कल्पोंकी होती है। उसका दिन भी उतना ही बड़ा बताया जाता है ।। ११ ।।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ।
एते विशेषा राजेन्द्र महाभूतेषु पञ्चसु ।। १२ ।।
राजेन्द्र! आकाश आदि पाँच महाभूतोंमें क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये विशेष गुण हैं ।।
यैराविष्टानि भूतानि अहन्यहनि पार्थिव ।
अन्योन्यं स्पृहयन्त्येते अन्योन्यस्य हिते रताः ।। १३ ।।
अन्योन्यमतिवर्तन्ते अन्योन्यस्पर्धिनस्तथा ।