भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार, मन और विषयोंकी कालसंख्याका एवं सृष्टिका वर्णन तथा इन्द्रियोंमें मनकी प्रधानताका प्रतिपादन

याज्ञवल्क्य उवाच

अव्यक्तस्य नरश्रेष्ठ कालसंख्यां निबोध मे ।
पञ्चकल्पसहस्राणि द्विगुणान्यहरुच्यते ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—नरश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे अव्यक्तकी काल-संख्या सुनो। दस हजार कल्पोंका (महायुगोंका) इस अव्यक्तका एक दिन बताया जाता है ॥ १ ॥

रात्रिरैतावती चास्य प्रतिबुद्धो नराधिप ।
सृजत्योषधिमेवाग्रे जीवनं सर्वदेहिनाम् ॥ २ ॥
नरेश्वर! उसकी रात्रि भी उतनी ही बड़ी होती है। ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा पहले समस्त प्राणियोंके जीवन-निर्वाहके लिये ओषधि (नाना प्रकारके अन्न) की सृष्टि करते हैं ॥ २ ॥

ततो ब्रह्माणमसृजद्धिरण्याण्डसमुद्भवम् ।
सा मूर्तिः सर्वभूतानामित्येवमनुशुश्रुम ॥ ३ ॥
हमने सुना है कि परमात्माने ओषधियोंकी सृष्टिके बाद ब्रह्माजीकी सृष्टि की थी, जो सुवर्णमय अण्डके भीतरसे प्रकट हुए थे। वे ही सम्पूर्ण भूतोंके उद्गमस्थान हैं ॥ ३ ॥

संवत्सरमुषित्वाण्डे निष्क्रम्य च महामुनिः ।
संदधे स महीं कृत्स्नां दिवमूर्ध्वं प्रजापतिः ॥ ४ ॥
वे महामुनि प्रजापति ब्रह्मा उस सुवर्णमय अण्डके भीतर एक वर्षतक निवास करके उससे बाहर निकल आये। फिर उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश और ऊर्ध्वलोक (स्वर्ग) की सृष्टिके लिये विचार आरम्भ किया ॥ ४ ॥

द्यावापृथिव्योरित्येष राजन् वेदेषु पठ्यते ।
तयोः शकलयोर्मध्यमाकाशमकरोत् प्रभुः ॥ ५ ॥
राजन्! शक्तिशाली ब्रह्माजीने उस अण्डके दोनों टुकड़ोंके एवं स्वर्ग तथा भूतलके मध्यभागमें आकाशकी सृष्टि की। यह बात वेदोंमें कही गयी है ॥ ५ ॥

एतस्यापि च संख्यानं वेदवेदाङ्गपारगैः ।
दशकल्पसहस्राणि पादोनान्यहरुच्यते ॥ ६ ॥