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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

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दीप्तः समीक्षते लोकान् किमाश्चर्यमतः परम् ।। ६ ।। सूर्यमण्डलके मध्यमें उसके अन्तर्यामी महात्मा सूर्यदेव अपनी उत्तम प्रभासे प्रकाशित होते हुए समस्त लोकोंका निरीक्षण करते हैं, उससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? ।। ६ ।। शुक्रो नामासितः पादो यश्च वारिधरोऽम्बरे । तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम् ।। ७ ।। शुक्र नामक काला मेघ, जो आकाशमें वर्षाके समय जल उत्पन्न करता है, वह इस सूर्यका ही स्वरूप है। इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य होगा? ।। ७ ।। योऽष्टमासांस्तु शुचिना किरणेनोक्षितं पयः । प्रत्यादत्ते पुनः काले किमाश्चर्यमतः परम् ।। ८ ।। सूर्यदेव बरसातमें पृथ्वीपर जो पानी बरसाते हैं, उसे अपनी विशुद्ध किरणोंद्वारा आठ महीनेमें पुनः खींच लेते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या होगी? ।। यस्य तेजोविशेषेषु स्वयमात्मा प्रतिष्ठितः । यतो बीजं मही चेयं धार्यते सचराचरा ।। ९ ।। यत्र देवो महाबाहुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः । अनादिनिधनो विप्र किमाश्चर्यमतः परम् ।। १० ।। विप्रवर! जिन सूर्यदेवके विशिष्ट तेजमें साक्षात् परमात्माका निवास है, जिनसे नाना प्रकारके बीज उत्पन्न होते हैं, जिनके ही सहारे चराचर प्राणियोंसहित यह समस्त पृथ्वी टिकी हुई है तथा जिनके मण्डलमें आदि-अन्तरहित महाबाहु सनातन पुरुषोत्तम भगवान् नारायण विराजमान हैं, उनसे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु और क्या हो सकती है? ।। ९-१० ।। आश्चर्याणामिवाश्चर्यमिदमेकं तु मे शृणु । विमले यन्मया दृष्टमम्बरे सूर्यसंश्रयात् ।। ११ ।। किंतु इन सब आश्चर्योंमें भी एक परम आश्चर्यकी यह बात जो मैंने सूर्यके सहारे निर्मल आकाशमें अपनी आँखों देखी है, उसे बता रहा हूँ—सुनिये ।। ११ ।। पुरा मध्याह्नसमये लोकांस्तपति भास्करे । प्रत्यादित्यप्रतीकाशः सर्वतः समदृश्यत ।। १२ ।। पहलेकी बात है, एक दिन मध्याह्नकालमें भगवान् भास्कर सम्पूर्ण लोकोंको तपा रहे थे। उसी समय दूसरे सूर्यके समान एक तेजस्वी पुरुष दिखायी दिया, जो सब ओरसे प्रकाशित हो रहा था ।। १२ ।। स लोकांस्तेजसा सर्वान् स्वभासा निर्विभासयन् । आदित्याभिमुखोऽभ्येति गगनं पाटयन्निव ।। १३ ।। वह अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करता हुआ मानो आकाशको चीरकर सूर्यकी ओर बढ़ा आ रहा था ।। १३ ।। हुताहुतिरिव ज्योतिर्व्याप्य तेजोमरीचिभिः ।