महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2439, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना
ब्राह्मण उवाच
विवस्वतो गच्छति पर्ययेण
वोढुं भवांस्तं रथमेकचक्रम्।
आश्चर्यभूतं यदि तत्र किंचिद्
दृष्टं त्वया शंसितुमर्हसि त्वम्॥ १॥
ब्राह्मणने कहा— नागराज! आप सूर्यके एक पहियेके रथको खींचनेके लिये बारी-बारीसे जाया करते हैं। यदि वहाँ कोई आश्चर्यजनक बात आपने देखी हो तो उसे बतानेकी कृपा करें॥ १॥
नाग उवाच
आश्चर्याणामनेकानां प्रतिष्ठा भगवान् रविः।
यतो भूताः प्रवर्तन्ते सर्वे त्रैलोक्यसम्मताः॥ २॥
नागने कहा— ब्रह्मन्! भगवान् सूर्य तो अनेकानेक आश्चर्योंके स्थान हैं; क्योंकि तीनों लोकोंमें जितने भी प्राणी हैं, वे सब उन्हींसे प्रेरित होकर अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं॥ २॥
यस्य रश्मिसहस्रेषु शाखास्विव विहंगमाः।
वसन्त्याश्रित्य मुनयः संसिद्धा दैवतैः सह॥ ३॥
जैसे वृक्षकी शाखाओंपर बहुत-से पक्षी बसेरा लेते हैं, उसी प्रकार सूर्यदेवकी सहस्रों किरणोंका आश्रय ले देवताओंसहित सिद्ध और मुनि निवास करते हैं॥ ३॥
यतो वायुर्विनिःसृत्य सूर्यरश्म्याश्रितो महान्।
विजृम्भत्यम्बरे तत्र किमाश्चर्यमतः परम्॥ ४॥
महान् वायुदेव सूर्यमण्डलसे निकलकर सूर्यकी किरणोंका आश्रय ले समूचे आकाशमें फैल जाते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?॥ ४॥
विभज्य तं तु विप्रर्षे प्रजानां हितकाम्यया।
तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम्॥ ५॥
ब्रह्मर्षे! प्रजाके हितकी कामनासे भगवान् सूर्य उस वायुको अनेक भागोंमें विभक्त करके वर्षा-ऋतुमें जो जलकी वृष्टि करते हैं, उससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?॥ ५॥
यस्य मण्डलमध्यस्थो महात्मा परमत्विषा।