महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextत्वयि चाहं द्विजश्रेष्ठ भवान् मयि न संशयः । लोकोऽयं भवतः सर्वः का चिन्ता मयि तेऽनघ ॥ ६ ॥ विप्रवर! आपमें मैं हूँ और मुझमें आप हैं, इसमें संशय नहीं है। निष्पाप ब्राह्मण! यह समस्त लोक आपका ही है। मेरे रहते हुए आपको किस बातकी चिन्ता है? ॥ ६ ॥
ब्राह्मण उवाच
एवमेतन्महाप्राज्ञ विदितात्मन् भुजङ्गम । नातिक्रान्तास्त्वया देवाः सर्वथैव यथातथम् ॥ ७ ॥ **ब्राह्मणने कहा—**महाप्राज्ञ आत्मज्ञानी नागराज! यह इसी प्रकार है। देवता भी आपसे बढ़कर नहीं हैं। यह बात सर्वथा यथार्थ है ॥ ७ ॥
स एव त्वं स एवाहं योऽहं स तु भवानपि । अहं भवांश्च भूतानि सर्वे यत्र गताः सदा ॥ ८ ॥ (आपने सूर्यमण्डलमें जिन पुरुषोत्तम नारायणदेवकी स्थिति बतायी है) मैं, आप तथा समस्त प्राणी सदा जिसमें स्थित हैं वही आप हैं, वही मैं हूँ और जो मैं हूँ, वही आप भी हैं ॥ ८ ॥
आसीत् तु मे भोगपते संशयः पुण्यसंचये । सोऽहमुञ्छव्रतं साधो चरिष्याम्यर्थसाधनम् ॥ ९ ॥ नागराज! मुझे पुण्यसंग्रहके विषयमें संशय हो गया था। मैं यह निश्चय नहीं कर पाता था कि किस साधनको अपनाऊँ? किंतु अब वह संदेह दूर हो गया है। साधो! अब मैं अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये उञ्छव्रतका ही आचरण करूँगा ॥ ९ ॥
एष मे निश्चयः साधो कृतं कारणमुत्तमम् । आमन्त्रयामि भद्रं ते कृतार्थोऽस्मि भुजङ्गम ॥ १० ॥ महात्मन्! यही मेरा निश्चय है। आपके द्वारा मेरा कार्य बड़े उत्तम ढंगसे सम्पन्न हो गया। भुजंगम! मैं कृतार्थ हो गया। आपका कल्याण हो। अब मैं जानेकी आज्ञा चाहता हूँ ॥ १० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने चतुःषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६४ ॥