भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागराजसे विदा ले ब्राह्मणका च्यवनमुनिसे उञ्छवृत्तिकी दीक्षा लेकर साधनपरायण होना और इस कथाकी परम्पराका वर्णन

भीष्म उवाच

स चामन्त्र्योरगश्रेष्ठं ब्राह्मणः कृतनिश्चयः ।
दीक्षाकाङ्क्षी तदा राजंश्च्यवनं भार्गवं श्रितः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार नागराजकी अनुमति लेकर वह दृढ़ निश्चयवाला ब्राह्मण उञ्छव्रतकी दीक्षा लेनेके लिये भृगुवंशी च्यवन ऋषिके पास गया ॥ १ ॥

स तेन कृतसंस्कारो धर्ममेवाधितिष्ठिवान् ।
तथैव च कथामेतां राजन् कथितवांस्तदा ॥ २ ॥

उन्होंने उसका दीक्षा-संस्कार सम्पन्न किया और वह धर्मका ही आश्रय लेकर रहने लगा। राजन्! उसने उञ्छवृत्तिकी महिमासे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको च्यवन मुनिसे भी कहा ॥ २ ॥

भार्गवेणापि राजेन्द्र जनकस्य निवेशने ।
कथैषा कथिता पुण्या नारदाय महात्मने ॥ ३ ॥

राजेन्द्र! च्यवनने भी राजा जनकके दरबारमें महात्मा नारदजीसे यह पवित्र कथा कही ॥ ३ ॥

नारदेनापि राजेन्द्र देवेन्द्रस्य निवेशने ।
कथिता भरतश्रेष्ठ पृष्टेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ ४ ॥

नृपश्रेष्ठ! भरतभूषण! फिर अनायास ही उत्तम कर्म करनेवाले नारदजीने भी देवराज इन्द्रके भवनमें उनके पूछनेपर यह कथा सुनायी ॥ ४ ॥

देवराजेन च पुरा कथितैषा कथा शुभा ।
समस्तेभ्यः प्रशस्तेभ्यो विप्रेभ्यो वसुधाधिप ॥ ५ ॥

पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समक्ष यह शुभ कथा कही ॥ ५ ॥

यदा च मम रामेण युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
वसुभिश्च तदा राजन् कथेयं कथिता मम ॥ ६ ॥