महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2447, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! जब परशुरामजीके साथ मेरा भयंकर युद्ध हुआ था, उस समय वसुओंने मुझे यह कथा सुनायी थी॥ पृच्छमानाय तत्त्वेन मया चैवोत्तमा तव । कथेयं कथिता पुण्या धर्म्या धर्मभृतां वर ॥ ७ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस समय जब तुमने परम धर्मके सम्बन्धमें मुझसे प्रश्न किया है, तब उसीके उत्तरमें मैंने यथार्थरूपसे यह पुण्यमयी धर्मसम्मत श्रेष्ठ कथा तुमसे कही है ॥ ७ ॥ यदयं परमो धर्मो यन्मां पृच्छसि भारत । आसीद् धीरो ह्यनाकाङ्क्षी धर्मार्थकरणे नृप ॥ ८ ॥ भरतनन्दन नरेश्वर! तुमने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, वह श्रेष्ठ धर्म यही है। वह धीर ब्राह्मण निष्काम-भावसे धर्म और अर्थसम्बन्धी कार्यमें संलग्न रहता था ॥ स च किल कृतनिश्चयो द्विजो भुजगपतिप्रतिदेशितात्मकृत्यः । यमनियमसहो वनान्तरं परिगणितोञ्छशिलाशनः प्रविष्टः ॥ ९ ॥ नागराजके उपदेशके अनुसार अपने कर्तव्यको समझकर उस ब्राह्मणने उसके पालनका दृढ़ निश्चय कर लिया और दूसरे वनमें जाकर उञ्छशिलवृत्तिसे प्राप्त हुए परिमित अन्नका भोजन करता हुआ यम-नियमका पालन करने लगा ॥ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६५ ॥
शान्तिपर्व सम्पूर्णम्
| अनुष्टुप् | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंका ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | गद्य | कुल योग | |
|---|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | १३२९६ ।। | (६०९) | ८३७ ।० | १३७ ।।।- | १४२७१ ।।० |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | ४३० ।। | (१७) | २३ ।० | ४५३ ।।।० | |
| शान्तिपर्वकी कुल श्लोक-संख्या | १४७२५ ।।- |