महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextराजासे जीविका चलानेवाले सेवक अधिक मुँहलगे हो जानेपर मालिकका अपमान कर बैठते हैं। वे अपनी मर्यादामें स्थिर नहीं रहते और स्वामीकी आज्ञाका उल्लंघन करने लगते हैं॥ ४९॥ प्रेष्यमाणा विकल्पन्ते गुह्यं चाप्यनुयुञ्जते । अयाच्यं चैव याचन्ते भोज्यान्याहारयन्ति च ॥ ५० ॥ वे जब किसी कार्यके लिये भेजे जाते हैं तो उसकी सिद्धिमें संदेह उत्पन्न कर देते हैं। राजाकी गोपनीय त्रुटियोंको भी सबके सामने ला देते हैं। जो वस्तु नहीं माँगनी चाहिये उसे भी माँग बैठते हैं, तथा राजाके लिये रखे हुए भोज्य पदार्थोंको स्वयं खा लेते हैं॥ ५०॥ क्रुश्यन्ति परिदीप्यन्ति भूमिपायाधितिष्ठते । उत्कोचैर्वञ्चनाभिश्च कार्याण्यनुविहन्ति च ॥ ५१ ॥ राज्यके अधिपति भूपालको कोसते हैं, उनके प्रति क्रोधसे तमतमा उठते हैं; घूस लेकर और धोखा देकर राजाके कार्योंमें विघ्न डालते हैं॥ ५१॥ जर्जरं चास्य विषयं कुर्वन्ति प्रतिरूपकैः । स्त्रीरक्षिभिश्च सज्जन्ते तुल्यवेषा भवन्ति च ॥ ५२ ॥ वे जाली आज्ञापत्र जारी करके राजाके राज्यको जर्जर कर देते हैं। रनवासके रक्षकोंसे मिल जाते हैं अथवा उनके समान ही वेशभूषा धारण करके वहाँ घूमते फिरते हैं॥ ५२॥ वान्तं निष्ठीवनं चैव कुर्वते चास्य संनिधौ । निर्लज्जा राजशार्दूल व्याहरन्ति च तद्वचः ॥ ५३ ॥ राजाके पास ही मुँह बाकर जँभाई लेते और थूकते हैं, नृपश्रेष्ठ! वे मुँहलगे नौकर लाज छोड़कर मनमानी बातें बोलते हैं॥ ५३॥ हयं वा दन्तिनं वापि रथं वा नृपसत्तम । अभिरोहन्त्यनादृत्य हर्षुले पार्थिवे मृदौ ॥ ५४ ॥ नृपशिरोमणे! परिहासशील कोमलस्वभाववाले राजाको पाकर सेवकगण उसकी अवहेलना करते हुए उसके घोड़े, हाथी अथवा रथको अपनी सवारीके काममें लाते हैं॥ ५४॥ इदं ते दुष्करं राजन्निदं ते दुष्टचेष्टितम् । इत्येवं सुहृदो वाचं वदन्ते परिषद्वताः ॥ ५५ ॥ आम दरबारमें बैठकर दोस्तोंकी तरह बराबरीका बर्ताव करते हुए कहते हैं कि 'राजन्! आपसे इस कामका होना कठिन है, आपका यह बर्ताव बहुत बुरा है'॥ क्रुद्धे चास्मिन् हसन्त्येव न च हृष्यन्ति पूजिताः । संघर्षशीलाश्च तदा भवन्त्यन्योन्यकारणात् ॥ ५६ ॥ इस बातसे यदि राजा कुपित हुए तो वे उन्हें देखकर हँस देते हैं और उनके द्वारा सम्मानित होनेपर भी वे धृष्ट सेवक प्रसन्न नहीं होते। इतना ही नहीं, वे सेवक परस्पर स्वार्थ-