महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 374, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यसनानि च सर्वाणि त्यजेथा भूरिदक्षिण । न चैव न प्रयुञ्जीत सङ्गं तु परिवर्जयेत् ॥ ४२ ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले नरेश्वर! तुम्हें सभी प्रकारके व्यसनोंको* त्याग देना चाहिये; परंतु साहस आदिका भी सर्वथा प्रयोग न किया जाय, ऐसी बात नहीं है (क्योंकि शत्रुविजय आदिके लिये उसकी आवश्यकता है); अतः सभी प्रकारके व्यसनोंकी आसक्तिका परित्याग करना चाहिये ॥ ४२ ॥
लोकस्य व्यसनी नित्यं परिभूतो भवत्युत । उद्वेजयति लोकं च योऽतिद्वेषी महीपतिः ॥ ४३ ॥
व्यसनोंमें आसक्त हुआ राजा सदा सब लोगोंके अनादरका पात्र होता है और जो भूपाल सबके प्रति अत्यन्त द्वेष रखता है, वह सब लोगोंको उद्वेगयुक्त कर देता है ॥ ४३ ॥
भवितव्यं सदा राज्ञा गर्भिणीसहधर्मिणा । कारणं च महाराज शृणु येनेदमिष्यते ॥ ४४ ॥
महाराज! राजाका प्रजाके साथ गर्भिणी स्त्रीका-सा बर्ताव होना चाहिये। किस कारणसे ऐसा होना उचित है, यह बताता हूँ, सुनो ॥ ४४ ॥
यथा हि गर्भिणी हित्वा स्वं प्रियं मनसोऽनुगम् । गर्भस्य हितमाधत्ते तथा राज्ञाप्यसंशयम् ॥ ४५ ॥ वर्तितव्यं कुरुश्रेष्ठ सदा धर्मानुवर्तिना । स्वं प्रियं तु परित्यज्य यद् यल्लोकहितं भवेत् ॥ ४६ ॥
जैसे गर्भवती स्त्री अपने मनको अच्छे लगने-वाले प्रिय भोजन आदिका भी परित्याग करके केवल गर्भस्थ बालकके हितका ध्यान रखती है, उसी प्रकार धर्मात्मा राजाको भी चाहिये कि निःसंदेह वैसा ही बर्ताव करे। कुरुश्रेष्ठ! राजा अपनेको प्रिय लगनेवाले विषयका परित्याग करके जिसमें सब लोगोंका हित हो वही कार्य करे ॥ ४५-४६ ॥
न संत्याज्यं च ते धैर्यं कदाचिदपि पाण्डव । धीरस्य स्पष्टदण्डस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ४७ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम्हें कभी भी धैर्यका त्याग नहीं करना चाहिये। जो अपराधियोंको दण्ड देनेमें संकोच नहीं करता और सदा धैर्य रखता है, उस राजाको कभी भय नहीं होता ॥ ४७ ॥
परिहासश्च भृत्यैस्ते नात्यर्थं वदतां वर । कर्तव्यो राजशार्दूल दोषमत्र हि मे शृणु ॥ ४८ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजसिंह! तुम्हें सेवकोंके साथ अधिक हँसी-मजाक नहीं करना चाहिये; इसमें जो दोष है, वह मुझसे सुनो ॥ ४८ ॥
अवमन्यन्ति भर्तारं संघर्षादुपजीविनः । स्वे स्थाने न च तिष्ठन्ति लंघयन्ति च तद्वचः ॥ ४९ ॥