महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextनवनवतितमोऽध्यायः
शूरवीरोंको स्वर्ग और कायरोंको नरककी प्राप्तिके विषयमें मिथिलेश्वर जनकका इतिहास
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रतर्दनो मैथिलश्च संग्रामं यत्र चक्रतुः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इसी विषयमें विज्ञ पुरुष उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिससे यह पता चलता है कि किसी समय राजा प्रतर्दन तथा मिथिलेश्वर जनकने परस्पर संग्राम किया था ॥ १ ॥
यज्ञोपवीती संग्रामे जनको मैथिलो यथा ।
योधानुद्घर्षयामास तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! यज्ञोपवीतधारी मिथिलापति जनकने रणभूमिमें अपने योद्धाओंको जिस प्रकार उत्साहित किया था, वह सुनो ॥ २ ॥
जनको मैथिलो राजा महात्मा सर्वतत्त्ववित् ।
योधान् स्वान् दर्शयामास स्वर्गं नरकमेव च ॥ ३ ॥
मिथिलाके राजा जनक बड़े महात्मा और सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता थे। उन्होंने अपने योद्धाओंको योगबलसे स्वर्ग और नरकका प्रत्यक्ष दर्शन कराया और इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
अभीरूणामिमे लोका भास्वन्तो हन्त पश्यत ।
पूर्णा गन्धर्वकन्याभिः सर्वकामदुहोऽक्षयाः ॥ ४ ॥
‘वीरो! देखो, ये जो तेजस्वी लोक दृष्टिगोचर हो रहे हैं, ये निर्भय होकर युद्ध करनेवाले वीरोंको प्राप्त होते हैं। ये अविनाशी लोक असंख्य गन्धर्वकन्याओं (अप्सराओं) से भरे हुए हैं और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ ४ ॥
इमे पलायमानानां नरकाः प्रत्युपस्थिताः ।
अकीर्तिः शाश्वती चैव यतितव्यमनन्तरम् ॥ ५ ॥
‘और देखो, ये जो तुम्हारे सामने नरक उपस्थित हुए हैं, युद्धमें पीठ दिखाकर भागनेवालोंको मिलते हैं। साथ ही इस जगत्में उनकी सदा रहनेवाली अपकीर्ति फैल जाती है; अतः अब तुम लोगोंको विजयके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५ ॥
तान् दृष्ट्वारीन् विजयत भूत्वा संत्यागबुद्धयः ।
नरकस्याप्रतिष्ठस्य मा भूत वशवर्तिनः ॥ ६ ॥