भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 662

‘उन स्वर्ग और नरक दोनों प्रकारके लोकोंका दर्शन करके तुम लोग युद्धमें प्राण-विसर्जनके लिये दृढ़ निश्चयके साथ डट जाओ और शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो। जिसकी कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं है, उस नरकके अधीन न होओ ।। ६ ।।
त्यागमूलं हि शूराणां स्वर्गद्वारमनुत्तमम् ।
इत्युक्तास्ते नृपतिना योधाः परपुरंजय ।। ७ ।।
अजयन्त रणे शत्रून् हर्षयन्तो नरेश्वरम् ।
तस्मादात्मवता नित्यं स्थातव्यं रणमूर्धनि ।। ८ ।।
‘शूरवीरोंको जो सर्वोत्तम स्वर्गलोकका द्वार प्राप्त होता है, उसमें उनका त्याग ही मूल कारण है’। शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले युधिष्ठिर! राजा जनकके ऐसा कहनेपर उन योद्धाओंने रणभूमिमें अपने महाराजका हर्ष बढ़ाते हुए उनके शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली; अतः मनस्वी वीरको सदा युद्धके मुहानेपर डटे रहना चाहिये ।। ७-८ ।।
गजानां रथिनो मध्ये रथानामनु सादिनः ।
सादिनामन्तरे स्थाप्यं पादातमपि दंशितम् ।। ९ ।।
गजारोहियोंके बीचमें रथियोंको खड़ा करे। रथियोंके पीछे घुड़सवारोंकी सेना रखे और उनके बीचमें कवच एवं अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित पैदलोंकी सेना खड़ी करे ।। ९ ।।
य एवं व्यूहते राजा स नित्यं जयति द्विषः ।
तस्मादेवं विधातव्यं नित्यमेव युधिष्ठिर ।। १० ।।
जो राजा अपनी सेनाका इस प्रकार व्यूह बनाता है, वह सदा शत्रुओंपर विजय पाता है; अतः युधिष्ठिर! तुम्हें भी सदा इसी प्रकार व्यूहरचना करनी चाहिये ।। १० ।।
सर्वे स्वर्गतिमिच्छन्ति सुयुद्धेनातिमन्यवः ।
क्षोभयेयुरनीकानि सागरं मकरा यथा ।। ११ ।।
सभी क्षत्रिय उत्तम युद्धके द्वारा स्वर्गलोक प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं; अतः जैसे मकर समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न कर देते हैं, उसी प्रकार वे अत्यन्त कुपित हो शत्रुओंकी सेनाओंमें हलचल मचा देते हैं ।। ११ ।।
हर्षयेयुर्विषण्णांश्च व्यवस्थाप्य परस्परम् ।
जितां च भूमिं रक्षेत् भग्नान् नात्यनुसारयेत् ।। १२ ।।
यदि अपने सैनिक विषादग्रस्त या शिथिल हो रहे हों तो उनका पूर्ववत् व्यूह बनाकर उन्हें परस्पर स्थापित करे और उन समस्त योद्धाओंका हर्ष एवं उत्साह बढ़ावे। जो भूमि जीत ली गयी हो, उसकी रक्षा करे; परंतु शत्रुओंके जो सैनिक पराजित होकर भाग रहे हों, उनका बहुत दूरतक पीछा नहीं करना चाहिये ।। १२ ।।