महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextइत्युक्तः स द्विजः प्राह तथास्त्विति नराधिपम् । एवं सम्भवंस्तस्य वरास्ते दीप्ततेजसः ॥ ११ ॥ उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने उस नरेशसे कहा—‘तथास्तु—ऐसा ही हो।’ फिर तो उस तेजस्वी राजाके लिये वे सभी वर उसी रूपमें सफल हुए ॥ ११ ॥
ततः स रथमास्थाय ज्वलनार्कसमद्युतिम् । अब्रवीद् वीर्यसम्मोहात् को वास्ति सदृशो मम ॥ १२ ॥ धैर्येवीर्येयशःशौर्यैविक्रमेणौजसापि वा । तदनन्तर राजा कार्तवीर्य अर्जुन सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी रथपर बैठकर (सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पानेके पश्चात्) बलके अभिमानसे मोहित हो कहने लगा—‘धैर्य, वीर्य, यश, शूरता, पराक्रम और ओजमें मेरे समान कौन है?’ ॥ १२ १/२ ॥
तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी ॥ १३ ॥ न त्वं मूढ विजानीषे ब्राह्मणं क्षत्रियाद् वरम् । सहितो ब्राह्मणेनेह क्षत्रियः शास्ति वै प्रजाः ॥ १४ ॥ उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई—‘मूर्ख! तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रियसे भी श्रेष्ठ है। ब्राह्मणकी सहायतासे ही क्षत्रिय इस लोकमें प्रजाकी रक्षा करता है’ ॥ १३-१४ ॥
अर्जुन उवाच
कुर्यां भूतानि तुष्टोऽहं क्रुद्धो नाशं तथानये । कर्मणा मनसा वाचा न मत्तोऽस्ति वरो द्विजः ॥ १५ ॥ कार्तवीर्य अर्जुनने कहा—मैं प्रसन्न होनेपर प्राणियोंकी सृष्टि कर सकता हूँ और कुपित होनेपर उनका नाश कर सकता हूँ। मन, वाणी और क्रियाद्वारा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है ॥ १५ ॥
पूर्वो ब्रह्मोत्तरो वादो द्वितीयः क्षत्रियोत्तरः । त्वयोक्तौ हेतुयुक्तौ तौ विशेषस्तत्र दृश्यते ॥ १६ ॥ इस जगत्में ब्राह्मणकी ही प्रधानता है—यह कथन पूर्वपक्ष है, क्षत्रियकी श्रेष्ठता ही उत्तर या सिद्धान्तपक्ष है। आपने ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंको प्रजापालनरूपी हेतुसे युक्त बताया है; परंतु उनमें यह अन्तर देखा जाता है ॥ १६ ॥
ब्राह्मणाः संश्रिताः क्षत्रं न क्षत्रं ब्राह्मणाश्रितम् । श्रिता ब्रह्मोपधा विप्राः खादन्ति क्षत्रियान् भुवि ॥ १७ ॥ ब्राह्मण क्षत्रियोंके आश्रित रहकर जीविका चलाते हैं, किंतु क्षत्रिय कभी ब्राह्मणके आश्रयमें नहीं रहता। वेदोंके अध्ययनाध्यापनके ब्याजसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मण इस भूतलपर क्षत्रियोंके ही सहारे भोजन पाते हैं ॥ १७ ॥