महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextक्षत्रियेष्वाश्रितो धर्मः प्रजानां परिपालनम्।
क्षत्राद् वृत्तिर्ब्राह्मणानां तैः कथं ब्राह्मणो वरः ॥ १८ ॥
प्रजापालनरूपी धर्म क्षत्रियोंपर ही अवलम्बित है। क्षत्रियसे ही ब्राह्मणोंको जीविका प्राप्त होती है। फिर ब्राह्मण क्षत्रियसे श्रेष्ठ कैसे हो सकता है? ॥ १८ ॥
सर्वभूतप्रधानांस्तान् भैक्षवृत्तीनहं सदा।
आत्मसम्भावितान् विप्रान् स्थापय्याम्यात्मनो वशे ॥ १९ ॥
आजसे मैं सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ कहे जानेवाले, सदा भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और अपनेको सबसे उत्तम माननेवाले ब्राह्मणोंको अपने अधीन रखूँगा ॥ १९ ॥
कथितं त्वनयासत्यं गायत्र्या कन्यया दिवि।
विजेष्याम्यवशान् सर्वान् ब्राह्मणांश्चर्मवाससः ॥ २० ॥
न च मां च्यावयेद् राष्ट्रात् त्रिषु लोकेषु कश्चन।
देवो वा मानुषो वापि तस्माज्ज्येष्ठो द्विजादहम् ॥ २१ ॥
आकाशमें स्थित हुई इस गायत्री नामक कन्याने जो ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे श्रेष्ठ बतलाया है, वह बिलकुल झूठ है। मृगछाला धारण करनेवाले सभी ब्राह्मण प्रायः विवश होते हैं, मैं इन सबको जीत लूँगा। तीनों लोकोंमें कोई भी देवता या मनुष्य ऐसा नहीं है, जो मुझे राज्यसे भ्रष्ट करे। अतः मैं ब्राह्मणसे श्रेष्ठ हूँ ॥ २०-२१ ॥
अद्य ब्रह्मोत्तरं लोकं करिष्ये क्षत्रियोत्तरम्।
न हि मे संयुगे कश्चित् सोढुमुत्सहते बलम् ॥ २२ ॥
संसारमें अबतक ब्राह्मण ही सबसे श्रेष्ठ माने जाते थे, किंतु आजसे मैं क्षत्रियोंकी प्रधानता स्थापित करूँगा। संग्राममें कोई भी मेरे बलको नहीं सह सकता ॥ २२ ॥
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा वित्रस्ताभून्निशाचरी।
अथैनमन्तरिक्षस्थस्ततो वायुरभाषत ॥ २३ ॥
अर्जुनकी यह बात सुनकर निशाचरी भी भयभीत हो गयी। तदनन्तर अन्तरिक्षमें स्थित हुए वायु देवताने कहा— ॥ २३ ॥
त्यजैनं कलुषं भावं ब्राह्मणेभ्यो नमस्कुरु।
एतेषां कुर्वतः पापं राष्ट्रक्षोभो भविष्यति ॥ २४ ॥
'कार्तवीर्य! तुम इस कलुषित भावको त्याग दो और ब्राह्मणोंको नमस्कार करो। यदि इनकी बुराई करोगे तो तुम्हारे राज्यमें हलचल मच जायगी ॥ २४ ॥
अथवा त्वां महीपाल शमयिष्यन्ति वै द्विजाः।
निरसिष्यन्ति ते राष्ट्राद्धतोत्साहा महाबलाः ॥ २५ ॥
'अथवा महीपाल! महान् शक्तिशाली ब्राह्मण तुम्हें शान्त कर देंगे। यदि तुमने उनके उत्साहमें बाधा डाली तो वे तुम्हें राज्यसे बाहर निकाल देंगे' ॥ २५ ॥
तं राजा कस्त्वमित्याह ततस्तं प्राह मारुतः।